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बुधवार, 29 अप्रैल 2020

भारती भाषासेतु प्रकल्प क्या है


भारती-भाषासेतु
आवाहन
नमस्कार मित्रों,
हम इस भारती-भाषासेतु प्रकल्पके पोर्टलपर तथा फेसबुक पन्नेपर आपका सहयोग चाहते हैं।
आपको सहयोगमें क्या करना है?

आरंभमे एकबार हमारे साथ लॉग-इन होना है। और हां, आरंभमें हमारी गति व प्रगति धीमी होगी। अतः धैर्य भी रखना है।
१) अपनी भाषामें कोई भी ३ शब्दोंवाला वाक्य यहाँ स्रोतके खानेमें लिखें।
२) संभव हो तो उसे देवनागरी लिपीमे भी लिखें और
३) संभव हो तो अपने मोबाईलपर उस वाक्यको रेकॉर्ड करके वह ऑडियो फाइल हमें भेजें।
४) संभव हो तो उसका अनुवाद संस्कृत या हिंदी या किसी भी अन्य भाषामें लिखें।
हम इसे अपने पोर्टलपर स्थानापन्न करेंगे। और चल पडेगी हमारे प्रकल्पकी नैया।

यह प्रकल्प क्या है और क्यों है

सारी भारतीय भाषाएँ कई दृष्टियोंसे एकात्म हैं। उनकी वर्णमाला, व्यंजनाक्षरोंमें स्वर जोडनेकी प्रक्रिया, वाक्यरचनाका व्याकरण, वाक्यमें शब्दोंकी स्थितिमें एकरूपता, शब्दोंकी समानता, शब्दोंके तद्जन्य रूप बनाने के नियम, आदि कई बातें समानता संजोये हुए हैं। सबसे महत्व की बात है कि शब्दोंसे उत्पन्न होनेवाले भाव नितांत भारतीय होने के कारण, सभी भाषाओंमें एकसा प्रभाव और एकसी अनुभूति उत्पन्न करते हैं। इसीका उदाहरण है कि एक जयहिंद का नारा पूरे भारतको जागृत करनेके लिये समर्थ था।
भारती भाषासेतुके माध्यमसे हमारा प्रयास है कि यह एकात्मता अधिक सुदृढ हो और ज्ञानप्रसारके लिये अधिक उपयोगी हो। हमारा पहला प्रयास यह है कि हम एक भाषाकी ग्रंथसंपदा दूसरी भाषामें वेगपूर्वक अनुवादित कर सकें, और इस कामके लिये ऐसे संगणक प्रणालीका विकास करे जिसमें किसी भारतीय भाषाको ही माध्यमभाषा बनाया जाये।

कई वर्ष पूर् सीडॅकने अंगरेजीको माध्यमभाषा बनाकर कुछ असफल प्रयास करके फिर भारतीय भाषाई अनुवादका प्रोजेक्ट बंद कर दिया। दूसरा प्रयास गूगलकी ओरसे हो रहा है और वह भी उतना सार्थक नही है जितना वे चाहते थे। गूगल भी अंगरेजीको ही माध्यमभाषाके रूपमें प्रयुक्त करता है और मेरे विचारमें यही सबसे बडी कारण है उनकी धीमी व असंतोषजनक परिस्थितिका।

इस संबंधमें एक बार मेरी गूगलके एक सीनियर अधिकारीसे चर्चा हुई। मैंने बडे उत्साहसे बताया आरंभ किया कि भारतीय भाषाओंकी वाक्यरचनाका कैसी होती है ओर वही हर भाषामें होती है। उदाहरण मैं पाठशालाको जाती हूँ का मराठी अनुवाद मी पाठशाळेला जाते या बंगाली अनुवाद आमी पाठशालाते जाच्ची ।

तीनोंमें कर्ता, कर्म और अन्तमें क्रियापद यही क्रम है। अतः शब्दशः अनुवाद करनेसे काम हो जाता है। लेकिन अंगरेजी अनुवाद आई गो टू स्कूल करनेमें दो भिन्नताएँ हैं। यहाँ टू स्कूल में कर्मपद स्कूल से पहले एक शब्द लगा है टू जो अंगरेजीमें प्रिपोझिशन कहलाता है। प्रिपोझिशन अर्थात कर्मपदसे पहले लगनेवाला शब्द। भारतीय भाषाओंमें यह पहले नही वरन बादमें लगते हैं। इन्हें हम प्रत्यय कहते हैं और ये कर्मपदके शब्दसे जुडकर रहते हैं जैसे पाठशालाको (हिंदी) पाठशाळेला (मराठी) पाठशालाते(बंगाली) या पाठशालाम् (संस्कृत)। अर्थात भारतीय भाषाओंमें प्रत्ययोंका अस्तित्व कर्मपदके ( या कर्तापदके, या क्रियापदके) अस्तित्वसे भिन्न नही होता। दूसरी भिन्नता है वाक्यमें शब्दक्रम की। अंगरेजी क्रम कर्ता, क्रिया, प्रिपोझिशन और अन्ततः कर्म इस प्रकार है। इसलिये यदि मैंने मराठीसे हिंदी अनुवाद हेतु एक संगणकप्रणाली बनानी चाही तो उसे मराठी-अंगरेजी-हिंदी की अपेक्षा मराठी-संस्कृत-हिंदी प्रणाली बनाना कई गुना अधिक सरल है।

इसपर गूगल महाशय मंद मंद मुस्काये। एक आँख दबाकर मुझसे पूछा - इसमें गूगलका क्या फायदा? मैं भौंचक। मैंने कहा आप बडे वेगपूर्वक भाषाई अनुवादका टूल (प्रणाली) बाजारमे उत्तर पायेंगे और पैसे कमायेंगे। उन्होंने सिर हिलाया। नही, ऐसा करनेपर भी हम भारतके मार्केटसे उतना पैसा नही कमा पायेंगे जितना आप सोचती हैं। भारत इस मामलेमें एक पूअर मार्केट है। मैं और भी हैरान हुई। मैंने पूछा - तो अभी आप जो अंगरेजीको माध्यमभाषा बनाकर अनुवाद कर रहे हैं अर्थात मराठी-अंगरेजी-हिंदी इस कारण आपका वेग भी घट रहा है और अनुवाद भी संतोषजनक नही है, उसमें तो आपको उतने भी पैसे नही मिलनेवाले। फिर आप यह काम क्यों कर रहे हैं ? वह और भी गूढ मुस्काये। फिर कहा अंग्रेजीको इस लूपमें रखकर हम अपना अंगरेजीका ज्ञानभांडार बढाते हैं। मराठीमें जो उपलब्ध है, वह भी हमें अनायास मिलेगा और कन्नड, तमिल, बंगाली इत्यादिमें जो है, वह भी। साथ ही एक मराठी अभिव्यक्ति कैसी होती है। उसके कण्ट्रास्टमें बंगाली अभिव्यक्ति कैसी होती है, तमिल कैसी होती है इत्यादी बातें हम जान पायेंगे। उन सबके प्रांतीय, अभिनिवेशोंका डेटा बेस हमारे पास जमा होता चलता है। ये दो फायदे हैं जिनके लिये गूगल इस अनुवाद प्रकल्पको चलाता है। लेकिन इसमें अंगरेजीका माध्यम भाषा बना रहना ही हमारी अहमियत या हमारी प्राथमिकता है।

मुझे फिर एक बार भारतियोंकी हतबलता का एहसास हुआ। गूगलके ५० से ६० प्रतिशत कर्मचारी भारतीय हैं। उन्हींके श्रम और बुद्धिमत्ताका उपयोग करते हुए गूगल हमारा ज्ञान भांडार अपने पास संग्रहित करेगा समय आनेपर हमें बेचेगा और हममें इतनी दूरदृष्टि भी नही अथवा इतना हौसला भी नही कि इस कामको अपने तरीकेसे अपने देशकी प्रतिभाओंको आवाहन कर संपन्न करा सकें। और अपने ज्ञानखजानेको इस प्रकार सरलतापूर्वक किसी अन्यको समर्पित होनेसे रोक सकें।

जो भी हो, अभी तो यही प्राथमिक उद्देश्य है कि हम बिचौली या माध्यमभाषाके रूपमें अंगरेजीका प्रयोग न कर अपनी ही किसी भाषाको माध्यम-भाषा बनाकर उसके आधारपर संगणक अनुवाद प्रणाली बनायें। इसके लिये हमने संस्कृतको माध्यम भाषाके रूपमें चुना हैं।


संस्कृत भाषाको क्यों चुना ? क्योंकि सभी देशी भाषाएँ संस्कृतोद्भव होनेके कारण उनकी शब्दावलीको संस्कृतमाध्यमसे समझाना सरल है। एक कठिनाई है कि संस्कृतमें शब्दोंका रूप लिंग, वचन, पुरूषके अनुसार बदलता है जब कि क्रियापदोंका रूप काल, वचन, पुरूषके अनुरूप बदलता है परन्तु लिंगानुरूप नही। कई भाषाओंमें क्रियापदोंका रूप भी लिंगानुरूप बदलता है, जिसके लिये संगणक प्रणालीमें कुछ अधिक काम करना पडेगा। फिर भी संस्कृतकी सबसे बडी सुविधा यह है कि इसे पूरे देशमें पढा-समझा जाता है अतः अधिक लोग इस कार्यमें जुड सकते हैं।

आपको सहयोगमें क्या करना है? आरंभमे एकबार हमारे साथ लॉग इन होना है। और हमारा वाक्य-भंडार बढाना है।

इस भंडारणके माध्यमसे हम संगणकको अनुवादका शास्त्र और कला दोनों सिखा पायेंगे ऐसी अभीकी सोच है।

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शनिवार, 25 अप्रैल 2020

************** पठामि व्याकरणं सूचि

पठामि व्याकरणं सूचि

पठामि व्याकरणं १ भाषा क्या है व्याकरण क्या है       ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १
पठामि व्याकरणं २ संज्ञा, सर्वनाम, पुरुष, वचन, लिंग    ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं २
पठामि व्याकरणं ३ विभक्ति, अकारान्त पुल्लिंग शब्द देवः     ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं ३
पठामि व्याकरणं ४ कर्मकी विभक्ति, कर्ता, कर्म और क्रिया -- तीन शब्दोंसे वाक्य बनाना ।      ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं ४
पठामि व्याकरणं ५ धातु अर्थात् क्रिया और उनके रूप, तिङ् प्रत्यय       ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं ५
पठामि व्याकरणं ६ धातुके लिये विभिन्न लकारोंका परिचय        ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं ६
पठामि व्याकरणं ७ तृतीया अर्थात् करणकी विभक्ति         ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं ७
पठामि व्याकरणं ८ उत्तम, मध्यम, प्रथम पुरुषके प्रमुख सर्वनामोंके रूप,          ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं ८
पठामि व्याकरणं ९ प्रश्नवाचक शब्द           ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं ९
पठामि व्याकरणं १० तुलना कौन जो, वह            ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १०
पठामि व्याकरणं ११ पांच दर्शक सर्वनाम             ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं ११
पठामि व्याकरणं १२ का कः किम् प्रश्नवाचक सर्वनाम           ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १२
पठामि व्याकरणं १३ लोट् लकार परस्मैपदी व आत्मनेपदी              ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १३
पठामि व्याकरणं १४ आगतम् स्वागतम् ---              ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १४
पठामि व्याकरणं १५ संज्ञासे धातु व धातुसे संज्ञा  संज्ञा-धातु-रचना Also Pathami Sanskritam 96      ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १५
पठामि व्याकरणं १६ आत्मनेपदी धातुके लङ् लकार Also Pathami Sanskritam 57       ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १६
पठामि व्याकरणं १७ संधि व समास                 ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १७
पठामि व्याकरणं १८ तत्पुरुष समास                  ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १८
पठामिसंस्कृतम् भाग १७ धातुरूप लट् लकार                ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं १९
पठामि व्याकरणं २० कर्मधारय समास                    ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं २०
पठामि व्याकरणं २१ लिट् लकार                     ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं २१
पठामि व्याकरणं २२-२३ द्वन्द्व समास                      ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं २२
पठामि व्याकरणं २४ अव्ययीभाव  समास                       ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं २४
पठामि व्याकरणं २५ द्विगु समास                        ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं २५
पठामि व्याकरणं २६ संधिके प्रकार स्वरसंधियाँ              ध्वनिफीत - पठामि व्याकरणं २६


मंगलवार, 21 मई 2019


भेडाघाट में चौसठ योगिनियाँ 
हरनाम सुनाऊँ तुम्हें लिख के 
शिव मंदिर प्रांगण में उनकी
दिव्याकृतियों से छवि छलके
नंदी पै सवार हैं पार्वती 
शिव शंकर जी सँग में उनके
चहुँओर विराजीं हैं योगिनियाँ
अब नाम कहूँ सुनिये सबके //१//

काली कपोतिका सिंहमुखी
वृहत्तुण्डा वाराही जगद्जननी
ललजिह्वा उलूकिका विकटानना
शरभानना काटत दैत्य अनी
श्वेनी मयूरी मार्जारी सुकी
कटपूतना चण्डी मनों दामिनी
क्रौंची कामाक्षी मृगाक्षी रक्ताक्षी
मृगलोचना यक्षिणी भयावनी //२//

रूक्षाक्षी केकराक्षी कुब्जा कोटराक्षी
वृहदकुक्षी माया महामोहिनी
ग्रधास्या सर्पास्या व्यत्तास्या प्रचण्डा
व्योमैक चरणोर्ध्वदृशी योगिनी
प्रेतवाहिनी तापिनी विद्युतप्रभा
दन्तसूककरा मानो सौदामिनी
अष्टवक्रा विकटलोचना पापहन्त्री
स्वदंष्ट्रा माँ काली महामोहिनी //३ //

गर्भभक्षा शवहस्त औ कपाल हस्ता
धूमा नि:श्वासा रुधिरपायनी
गजानना पाशहस्ता शिशुघ्नी
अट्टाट्टहासा हैं भय दायनी
बलाकास्या हयग्रीवा वानरांनना
मृगाशीर्षा हैं सिद्धियाँ प्रदायनी
नमोसुराप्रिया काकतुंडिका
आन्त्रमालिनी दुष्टों की दुखदायनी //४//

पुष्टग्रीवा शिवारावा शुष्कोदरी
चण्डविक्रमा वृषानना कोटरी
दण्डहस्ता वसाधया सहोदरी
शोषणीदृष्टि जय काली महोदरी
तुमही स्थूलकेशी स्थूलनासिका
तेरे रूप अनेकों हैं माँ कालिका
मेरा सत सत नमन हे जगतपालिका
कृपादृष्टि करो सृष्टि की नायिका //५//

दोहा -चौसठ योगिनि का करे,नाम रूप गुणगान /
"मधुकर"उस माँ भक्त के संकट परें न प्राण //

क्या आप को पता है चौसठ योगिनियो के नाम
आदिशक्ति का सीधा सा सम्बन्ध है इस शब्द का जिसमे प्रकृति या ऐसी शक्ति का बोध होता जो उत्पन्न करने और पालन करने का दायित्व निभाती है,
जिसने भी इस शक्ति की शरण में खुद को समर्पित कर दिया उसे फिर किसी प्रकार कि चिंता करने कि कोई आवश्यकता नहीं वह परमानन्द हो जाता है!

चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता आदिशक्ति कि सहायक शक्तियों के रूप में मानी जाती हैं जिनकी मदद से माता आदिशक्ति इस संसार का राज काज चलाती हैं एवं श्रष्टि के अंत काल में ये मातृका शक्तियां वापस माँ आदिशक्ति में पुनः विलीन हो जाती हैं और सिर्फ माँ आदिशक्ति ही बचती हैं फिर से पुनर्निर्माण के लिए,
बहुत बार देखने में आता है कि लोग वर्गीकरण करने लग जाते हैं और उसी वर्गीकरण के आधार पर साधकगण अन्य साधकों को हीन - हेय दृष्टि से देखने लग जाते हैं क्योंकि उनकी नजर में उनके द्वारा पूजित रूप को वे मूल या प्रधान समझते हैं और अन्य को द्वितीय भाव से देखते हैं जबकि ऐसा उचित नहीं है हर साधक का दुसरे साधक के लिए सम भाव होना चाहिए मैं किन्तु नैतिक दृष्टिकोण और अध्यात्मिकता के आधार पर यदि देखा जाये तो न तो कोई उच्च है न कोई हीन हम आराधना करते हैं तो कोई अहसान नहीं करते यह सिर्फ अपनी मानसिक शांति और संतुष्टि के लिए और अगर कोई दूसरा करता है तो वह भी इसी उद्देश्य कि पूर्ती के लिए !
अब अगर हम अपने विषय पर आ जाएँ तो इस मृत्यु लोक में मातृ शक्ति के जितने भी रूप विदयमान हैं सब एक ही विराट महामाया आद्यशक्ति के अंग,भाग , रूप हैं साधकों को वे जिस रूप की साधना करते हैं उस रूप के लिए निर्धारित व्यवहार और गुणों के अनुरूप फल प्राप्त होता है।
चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता दुर्गा कि सहायक शक्तियां है जो समय समय पर माता दुर्गा कि सहायक शक्तियों के रूप में काम करती है एवं दुसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो यह मातृका शक्तियां तंत्र भाव एवं शक्तियों से परिपूरित हैं और मुख्यतः तंत्र ज्ञानियों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र हैं !
जिन नामों का अस्तित्व मिलता है वे इस प्रकार हैं :-
१. बहुरूपा
२. तारा
३. नर्मदा
४. यमुना
५. शांति
६. वारुणी
७. क्षेमकरी
८. ऐन्द्री
९. वाराही
१०. रणवीरा
११. वानरमुखी
१२. वैष्णवी
१३. कालरात्रि
१४. वैद्यरूपा
१५. चर्चिका
१६. बेताली
१७. छिनमास्तिका
१८. वृषभानना
१९. ज्वाला कामिनी
२०. घटवारा
२१. करकाली
२२. सरस्वती
२३. बिरूपा
२४. कौबेरी
२५. भालुका
२६. नारसिंही
२७. बिराजा
२८. विकटानन
२९. महालक्ष्मी
३०. कौमारी
३१. महामाया
३२. रति
३३. करकरी
३४. सर्पश्या
३५. यक्षिणी
३६. विनायकी
३७. विन्द्यावालिनी
३८. वीरकुमारी
३९. माहेश्वरी
४०. अम्बिका
४१. कामायनी
४२. घटाबारी
४३. स्तुति
४४. काली
४५. उमा
४६. नारायणी
४७. समुद्रा
४८. ब्राह्मी
४९. ज्वालामुखी
५०. आग्नेयी
५१. अदिति
५२. चन्द्रकांति
५३. वायुबेगा
५४. चामुंडा
५५. मूर्ति
५६. गंगा
५७. धूमावती
५८. गांधारी
५९. सर्व मंगला
६०. अजिता
६१. सूर्य पुत्री
६२. वायु वीणा
६३. अघोरा
६४. भद्रकाली
योगिनी शक्ति को पूजा और कर्मकांड के समय जरूर पूजा जाता है उनके बिना कोई भी कर्मकांड पूरा नहीं होता.
किन्तु एक सबसे बड़ा राज भी है जिससे आम जनमानस अपरिचित ही है. वो है चौसठ कलाओं का इन योगिनियों से गहरा और गुप्त सम्बन्ध.
यदि इन योगिनियों को जान लिया जाए तो आप चौसठ कलाओं में निष्णांत हो सकते हैं.
चौसठ कलाओं का साकार रूप ही चौसठ योगिनियाँ हैं. लेकिन ये सारा ज्ञान गुप्त है.
गुरु के आश्रय में ही परम योग्य शिष्य इस ज्ञान को ग्रहण कर पाता है. चौसठ कलाओं को समझाना ही कठिन हैं कोई उनको सीख ले ये तो कल्पनाओं का वास्तविक हो जाने जैसे है.
समस्त ब्रह्माण्ड के देवी देवताओं की प्रतिमाओं में जब शक्तियां या कलाएं कम हो जाती है तो आज भी वो इस ६४ योगिनियों के पास जा कर ही शक्ति प्राप्त करते है.
****** 64 कलाओं का रहस्य ******
16 कलाओ से परिपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण,
भगवान परशुराम आठ कलाओंसे युक्त थे,
भगवान राम बारह कलाओंसे युक्त थे,
कृष्ण ही एक मात्र ऐसे देव है जो 16कलाओंसे परिपूर्ण अवतरित हुए. जिन्हें पूर्ण अवतार कहा गया है.
क्या आप को पता हैं यह सारा विश्व प्राण शक्ति की पर
टिका है. यहाँ पर सब कुछ में कुछ प्राण शक्ति होती हैं. किन्तु प्राण के मात्रक (यूनिट) भिन्न होते हैं. पत्थर से लेकर वायु तक, जानवरों से लेकर मनुष्य तक, सब में अलग अलग मात्रा में प्रा उर्जा मौजूद है.
1.पत्थर (पृथ्वी) में प्राण का 1 (कला)युनिट होता हैं.
2.जल में प्राण के 2 (कला)युनिट होते हैं.
3.अग्नि में प्राण के 3(कला)युनिट होते हैं.
4.वायु में प्राण के 4(कला)युनिट होते हैं.
5.आकाश में प्राण के 5(कला)युनिट होते हैं.
6.पेड़ और पशुओ में प्राण के 5(कला)मात्रक होते हैं.
मानवो में प्राण के 6-7 मात्रक होते हैं.परन्तु मनुष्य
प्राणों की उच्चतम ईकाई अभिव्यक्त करने की संभावना के साथ पैदा होता है...
इससे आगे 9 कलाए "महापुरुषों,ऋषि मुनियों"
में होती है, और इससे भी ज्यादा कलाए, भगवान के अंश अवतार "वाराह, नरसिहं" आदि में होती है.
भगवान कृष्ण में प्राण की 16 कलाएं थी, उनकी चेतना पूर्ण विकसित है और इसलिए उन्हे पद्द्मनाभा भी कहते हैं.
श्री कृष्ण की सोलह कलाएं इस प्रकार है-
प्रथम कला-अन्नमय,
द्वितीय कला -प्राणमय,
तृतीय कला- मनोमय
चतुर्थ कला-विज्ञानमय,
पंचम कला -आनंदमय,
(उपरोक्त पांच कलाएं हर मनुष्य में पहले से ही होती हैं)
षष्टम कला-अतिशयिनी,
सप्तम कला-विपरिनाभिमी,
अष्टम कला-संक्रमिनी,
नवम कला-प्रभवि,
दशम कला-कुंथिनी,
ग्यारहवीं कला-विकासिनी,
बारहवी कला -मर्यदिनी,
तेरहवीं कला-सन्हालादिनी,
चौदहवी कला-आह्लादिनी,
पंद्रहवीं कला-परिपूर्ण,
सोलहवी कला-स्वरुपवस्थित.
भगवान श्री कृष्ण की 64 कलाए
भगवान श्रीकृष्ण जब संदीपनी जी के आश्रम में पढ़ने गए तब उन्होंने 64 दिनों में 64 कलाये सीख ली, वे सभी कलाओ में निपुण थे,
भगवान सर्वज्ञ हैं, अतः इन कलाओं के ज्ञाता होना कोई
बड़ी बात भगवान के लिए नहीं है.
वे64कलाये इस प्रकार हैं
व्यवहारिक ४४ कलाएँ-
1. ध्यान, प्राणायाम, आसन आदि की विधि
2. हाथी, घोड़ा, रथ आदि चलाना
3. मिट्टी और कांच के बर्तनों को साफ रखना
4. लकड़ी के सामान पर रंग-रोगन सफाईकरना
5. धातु के बर्तनों को साफ करना और उन पर पालिश करना
6. चित्र बनाना
7. तालाब, बावड़ी, कमान आदि बनाना
8. घड़ी, बाजों और दूसरी मशीनों को सुधारना
9. वस्त्र रंगना
10. न्याय, काव्य, ज्योतिष, व्याकरण सीखना
11. नांव, रथ, आदि बनाना
12. प्रसव विज्ञान
13. कपड़ा बुनना, सूत कांतना, धुनना
14. रत्नों की परीक्षा करना
15. वाद-विवाद, शास्त्रार्थ करना
16. रत्न एवं धातुएं बनाना
17. आभूषणों पर पालिश करना
18. चमड़े की मृदंग, ढोल नगारे, वीणा वगैरेह तैयार करना
19. वाणिज्य
20. दूध दुहना
21. घी, मरूवन तपाना,
22. कपड़े सीना
23. तरना
24. घर को सुव्यवस्थित रखना
25. कपड़े धोना
26. केश-श्रृंगार
27. मृदु भाषण वाक्पटुता
28. बांस के टोकने, पंखे, चटाई आदि बनाना
29. कांच के बर्तन बनाना
30. बाग बगीचे लगाना, वृक्षारोपण, जल सिंचन करना
31. शस्त्रादि निर्माण
32. गादी गोदड़े-तकिये बनाना
33. तैल निकालना
34. वृक्ष पर चढ़ना
35. बच्चों का पालन पोषण करना
36. खेती करना
37. अपराधी को उचित दंड देना
38. भांति भांति के अक्षर लिखना
39. पान सुपारी बनाना और खाना
40. प्रत्येक काम सोच समझकर करना
41. समयज्ञ बनना
42. रंगे हुए चांवलों से मंडल मांडना
43. सुगन्धित इत्र, तैल-धूपादि बनाना
44. हस्त कौशल-जादू के खेल से मनोरंजन करना
संगीत की ७ कलाएं :
1. नृत्य
2. वादन
3. श्रृंगार
4. आभूषण,
5. हास्यादि हाव-भाव
6. शय्या-सजाना
7. शतरंज आदि कौतुकी क्रीड़ा करना
आयुर्वेदशास्त्र की ८ कलाएं :
1. आसव, सिर्का, आचार, चटनी, मुरब्बे बनाना
2. कांटा-सूई आदि शरीर में से निकालना, आंख का कचरा कंकर
निकालना,
3. पाचक चूर्ण बनाना
4. औषधि के पौधे लगाना
5. पाक बनाना
6. धातु, विष, उपविष के गुण दोष जानना
7. भभके से अर्क खीचना
8. रसायन-भस्मादि बनाना
धनुर्वेद सम्बन्धी ५ कलाएं :
1. लड़ाई लड़ना
2. कुश्ती लड़ना
3. निशाना लगाना
4. व्यूह प्रवेश-निर्गमन एवं रचना
5. हाथी, घोड़े, मेंढे सांड, लड़ाना
साभार:
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1262391400476966&id=100001183533798
























रविवार, 20 जनवरी 2019

कुंभ के 14 अखाड़े

*कुंभ मेला 2019: ये हैं कुंभ के 14 अखाड़े, जानें क्या है महत्व🙏🏻🚩👇🏻👇🏻*

🚩कुंभ का मेला विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन में से एक है. लाखों की संख्या में लोग इस मेले में शामिल होते हैं. कुंभ का मेला हर 12 वर्षों के अंतराल होता है. लेकिन कुंभ का पर्व हर बार सिर्फ 4 पवित्र नदियों में से किसी एक नदी के तट पर ही आयोजित किया जाता है. जिनमें हरिद्वार में गंगा, उज्जैन की शिप्रा, नासिक की गोदावरी और इलाहाबाद में जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन होता है।।🚩

*क्या होते हैं अखाड़े👇🏻👇🏻❓❓*

कुंभ में अखाड़ों का विशेष महत्व होता है. अखाड़े शब्द की शुरुआत मुगलकाल के दौर से हुई. अखाड़ा साधुओं का वह दल होता है, जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है।।

*क्या होती है पेशवाई❓❓🚩🙏🏻👇🏻👇🏻👇🏻*

जब कुंभ में नाचते-गाते धूमधाम से अखाड़े जाते हैं, तो उसे  पेशवाई कहते हैं. कहा जाता है कि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में 13 अखाड़े बनाए थे. तब से वही अखाड़े बने हुए थे. लेकिन इस बार एक और अखाड़ा जुड़ गया है, जिस कारण इस बार कुंभ में 14अखाड़ों की पेशवाई देखने की मिलेगी।।🚩👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻

*आइए जानें इन 14 अखाड़ों के बारे में🚩🙏🏻👇🏻👇🏻👇🏻*

*1. अटल अखाड़ा👉🏻* इनके ईष्ट देव भगवान गणेश हैं. इस अखाड़े में केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य दीक्षा ले सकते हैं और कोई अन्य इस अखाड़े में नहीं आ सकता है. यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है।।🚩

*2. अवाहन अखाड़ा-👉🏻* इनके ईष्ट देव श्री दत्तात्रेय और श्री गजानन दोनो हैं. इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है।।🚩

*3. निरंजनी अखाड़ा👉🏻-* यह अखाड़ा सबसे ज्यादा शिक्षित अखाड़ा है. इस अखाड़े में करीब 50 महामंडलेश्र्चर हैं. इनके ईष्ट देव भगवान शंकर के पुत्र कार्तिक हैं. इस अखाड़े की स्थापना 826 ईसवी में हुई थी।।🚩

*4. पंचाग्नि अखाड़ा 👉🏻* इस अखाड़े में केवल ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही दीक्षा ले सकते है. इनकी इष्ट देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी है.🚩

*5. महानिर्वाण अखाड़ा-👉🏻* महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा का जिम्‍मा इसी अखाड़े के पास है. इनके ईष्ट देव कपिल महामुनि हैं. इनकी स्थापना 671 ईसवी में हुई थी।।🚩

*6. आनंद अखाड़ा- 👉🏻* इस अखाड़े की स्थापना 855 ईसवी में हुई थी. इस अखाड़े के आचार्य का पद ही प्रमुख होता है. इसका केंद्र वाराणसी है।।🚩

*7. निर्मोही अखाड़ा👉🏻-* वैष्णव संप्रदाय के तीनों अणि अखाड़ों में से इसी में सबसे ज्यादा अखाड़े शामिल हैं. इस अखाड़े की स्थापना रामानंदाचार्य ने 1720 में की थी. इस अखाड़े के मंदिर उत्तर प्रदेश, मध्या प्रदेश, गुजरात, बिहार, राजस्थान आदि जगहों पर स्थित हैं।।🚩

*8. बड़ा उदासीन पंचायती अखाड़ा👉🏻* इस अखाड़े की शुरुआत 1910 में हुई थी. इस अखाड़े के संस्थापक श्रीचंद्रआचार्य उदासीन हैं. इस अखाड़े उद्देश्‍य सेवा करना है🚩.

*9. नया उदासीन अखाड़ा👉🏻-* इस अखाड़े की शुरुआत 1710 में हुई थी. मान्यता है कि इस अखाड़े को बड़ा उदासीन अखाड़े के साधुओं ने बनाया था.🚩

*10. निर्मल अखाड़ा-👉🏻* इस अखाड़े की स्थापना श्रीदुर्गासिंह महाराज ने की थी,जिनके ईष्टदेव पुस्तक श्री गुरुग्रंथ साहिब हैं. कहा जाता है कि इस अखाड़े के लोगों को दूसरे अखाड़ों की तरह धूम्रपान करने की इजाजत नहीं है।।🚩

*11. वैष्णव अखाड़ा👉🏻-* इस अखाड़े की स्थापना मध्यमुरारी द्वारा की गई थी.🚩

*12. नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा👉🏻* इस अखाड़े की स्थापना 866 ईसवी में हुई,जिसके संस्थापक पीर शिवनाथ जी हैं.🚩

*13. जूना अखाड़ा👉🏻* इस अखाड़े के ईष्टदेव रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं. हरिद्वार में इस अखाड़े का आश्रम है. इस अखाड़े के पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज हैं🚩

*14. किन्नर अखाड़ा-👉🏻* अभी तक कुंभ में 13 अखाड़ों की पेशवाई होती थी,लेकिन इस बार कुंभ में किन्नर अखाड़ा भी शामिल हो चुका है. इस अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी हैं।।🚩