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शनिवार, 28 मई 2016

आठ प्रहर


दिन-रात मिलाकर 24 घंटे में हिंदू धर्म अनुसार होते हैं। औसतन एक प्रहर तीन घंटे का होता है जिसमें दो होते हैं। 
एक प्रहर तीन घंटे या साढ़े सात घटी का होता है। एक घटी 24 मिनट की होती है। दिन के चार और रात के चार मिलाकर कुल आठ प्रहर। भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रत्येक राग के गाने का समय निश्चित है। प्रत्येक राग प्रहर अनुसार निर्मित है।

के नाम :
दिन के चार प्रहर- पूर्वान्ह, मध्यान्ह, अपरान्ह और सायंकाल। रात के चार प्रहर- प्रदोष, निशिथ, त्रियामा एवं उषा। प्रत्येक प्रहर में गायन, पूजन, जप और प्रार्थना का महत्व है।
सूर्योदय के समय दिन का पहला प्रहर प्रारंभ होता है जिसे पूर्वान्ह कहा जाता है। 
दिन का दूसरा प्रहर जब सूरज सिर पर आ जाता है तब तक रहता है जिसे मध्याह्न कहते हैं।

वैष्णव मन्दिरों में की सेवा-पूजा का विधान 'अष्टयाम' कहा जाता है। वल्लभ सम्प्रदाय में मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या-आरती तथा शयन के नाम से ये कीर्तन-सेवाएं हैं। अष्टयाम हिन्दी का अपना विशिष्ट काव्य-रूप जो रीतिकाल में विशेष विकसित हुआ।


The traditional system of praharas overlaps (but does not coincide) with the more precise traditional system of muhurtas, which is based on precise astronomical calculations.

Thus, the day can be regarded as divided into eight praharas (of three hours each) or thirty muhurtas (of 48 minutes each). In both systems, the day commences with sunrise. The timing of the two systems coincides only at sunrise and sunset (four praharas coincide with fifteen muhurtas

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 महर्षि मरीचि ब्रह्मा के अन्यतम मानसपुत्र और एक प्रधान प्रजापति हैं। इन्हें द्वितीय ब्रह्मा ही कहा गया है। ऋषि मरीचि पहले मन्वंतर के पहले सप्तऋषियों की सूची के पहले ऋषि है। यह दक्ष के दामाद और शंकर के साढू थे।

इनकी पत्नि दक्ष- कन्या संभूति थी। इनकी दो और पत्नियां थी- कला और उर्णा। संभवत: उर्णा को ही धर्मव्रता भी कहा जाता है जो एक ब्राह्मण कन्या थी। दक्ष के यज्ञ में मरीचि ने भी शंकर का अपमान किया था। इस पर शंकर ने इन्हें भस्म कर डाला था।

इन्होंने ही भृगु को दण्डनीति की शिक्षा दी है। ये सुमेरु के एक शिखर पर निवास करते हैं और महाभारत में इन्हें चित्रशिखण्डी कहा गया है। ब्रह्मा ने पुष्करक्षेत्र में जो यज्ञ किया था उसमें ये अच्छावाक् पद पर नियुक्त हुए थे। दस हजार श्लोकों से युक्त ब्रह्मपुराण का दान पहले-पहल ब्रह्मा ने इन्हीं को किया था। वेद और पुराणों में इनके चरित्र का चर्चा मिलती है। 

मरीचि ने कला नाम की स्त्री से विवाह किया और उनसे उन्हें कश्यप नामक एक पुत्र मिला। कश्यप की माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और ऋषि कपिल देव की बहन थी। ब्रह्मा के पोते और मरीचि के पुत्र कश्यप ने ब्रह्मा के दूसरे पुत्र दक्ष की 13 पुत्रियों से विवाह किया। मुख्यत इन्हीं कन्याओं से सृष्टि का विकास हुआ और कश्यप सृष्टिकर्ता कहलाए।

कश्यय पत्नी- अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्ठा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि। महर्षि कश्यप को विवाहित 13 कन्याओं से ही जगत के समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। वे लोकमाताएं कही जाती हैं। इन माताओं को ही जगत जननी कहा जाता है।

यहां यह बताना जरूरी है कि बहुत से विद्वान मानते हैं कि कश्यप ने दक्ष की 17 कन्याओं से विवाह किया था लेकिन ऐसा नहीं है। वो तार्क्ष्य कश्यप थे जिन्होंने विनीता कद्रू, पतंगी और यामिनी से विवाह किया था। इस तरह ये 17 कन्याएं होती है, लेकिन कुछ विद्वान सभी को कश्यप की पत्नी मान कर लिखते हैं। कश्यप ऋषि ने दक्ष की सिर्फ 13 कन्याओं से ही विवाह किया था।

कश्यप की पत्नी अदिति से आदित्य (देवता), दिति से दैत्य, दनु से दानव, काष्ठा से अश्व आदि, अरिष्ठा से गंधर्व, सुरसा से राक्षस, इला से वृक्ष, मुनि से अप्सरागण, क्रोधवशा से सर्प, ताम्रा से श्येन-गृध्र आदि, सुरभि से गौ और महिष, सरमा से श्वापद (हिंस्त्र पशु) और तिमि से यादोगण (जलजंतु) की उत्पत्ति हुई।

कश्यप के आदिति से 12 आदित्य पुत्रों का जन्म हुए जिनमें विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। राजा इक्ष्वाकु के कुल में जैन और के महान तीर्थंकर, भगवान, राजा, साधु महात्मा और सृजनकारों का जन्म हुआ है।

वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- 1.इल, 2.इक्ष्वाकु, 3.कुशनाम, 4.अरिष्ट, 5.धृष्ट, 6.नरिष्यन्त, 7.करुष, 8.महाबली, 9.शर्याति और 10.पृषध।

इक्ष्वाकु के पुत्र और उनका वंश : मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु के तीन पुत्र हुए:- 1.कुक्षि, 2.निमि और 3.दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। भगवान राम इक्षवाकु कुल में ही जन्में।

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सबसे प्रथम धर्मग्रंथ : वेद की वाणी को ईश्वर की वाणी कहा जाता है। वेद संसार के सबसे प्राचीन धर्मग्रंथ हैं। वेद को 'श्रुति' भी कहा जाता है। 'श्रु' धातु से 'श्रुति' शब्द बना है। 'श्रु' यानी सुनना। कहते हैं कि इसके मंत्रों को ईश्वर (ब्रह्म) ने प्राचीन तपस्वियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था जब वे गहरी तपस्या में लीन थे।

सर्वप्रथम ईश्वर ने चार ऋषियों को वेद ज्ञान दिया:- अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य

तत्पश्चात अन्य मनु --
स्वायम्भु, स्वरोचिष, औत्तमी, तामस, मनु, रैवत, चाक्षुष।
वर्तमान - वैवश्वत मनु।






















गुरुवार, 12 मई 2016

संस्कृत क्रियापदे

झोपतो------ शेते         (मूल धातु शी)  अदादिगण 
        शेते शयाते शेयते
        शेथे शयाथे शेध्वे
        शये सेवहे शेमहे

उठतो-----------  उत्तिष्ठति
बसतो---------उपविशति
खातो-------------खादति
पितो----------- पिबति
जातो---------गच्छति
येतो---------------आगच्छति
गातो--------------
नाचतो------------नृत्यति
खेळतो --------क्रीडति
पळतो----------------धावति
चालतो------------------चलति
थांबतो----------------तिष्ठति
बोलतो ---------------- वदति
रडतो------------------रोदति
हसतो----------------हसति
देतो --------------ददाति
घेतो-------------------
विचारतो-------------पृच्छति
दाखवतो----------------दर्शयति

शुक्रवार, 6 मई 2016

गीता अध्याय १० विभूति-वर्णन

गीता अध्याय १० विभूति-वर्णन
http://geetahindi.blogspot.com/2012/09/10.html

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌ ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ (२१)


वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ (२२)


रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌ ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌ ॥ (२३)


पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌ ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ (२४)



महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ (२५)

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ (२६)

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ (३३
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌ ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ (३४)
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्‌ ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ (३५)
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌ ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌ ॥ (३६)


वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ (३७)


दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्‌ ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्‌ ॥ (३८)


यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌ ॥ (३९)



नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ (४०)


यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌ ॥ (४१)


अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥ (४२)



ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥
॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥




शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

लक्ष्मणानुव्यञ्जनपटलम्


लक्ष्मणानुव्यञ्जनपटलम्
तत्र तथागतविहारमारभ्य ताथागतीञ्च निष्ठागमनभूमिं भगवतां चत्वारिंशदुत्तरमावेणिकं बुद्धधर्मशतं भवति। द्वात्रिंशन्महापुरुषलक्षणानि अशीत्युनुव्यञ्जनानि चतस्रः सर्वाकाराः परिशुद्धयः दश तथागतबलानि चत्वारि वैशारद्यानि त्रीणि स्मृत्युपस्थानानि त्रीण्यरक्षाणि महांकरुणाऽसम्मोषधर्मता वासना-समुद्धातः सर्वाकार-वरज्ञानञ्च।
द्वात्रिंशन्महापुरुषलक्षणानि कतमानि। सुप्रतिष्ठितपादो महापुरुषः सममाक्रमति महीम्। इदं महापुरुषस्य महापुरुषलक्षणम्। अधस्थात्पादतलयोश्चक्रे जाते सहस्रारे सनाभिके सनेमिके सर्वाकारपरिपूर्णे। दीर्घाङ्गुलिमंहापुरुषः। आयतपादपार्ष्णिः। मृदुतरुणपाणिपादः। जालपाणिपादः। उच्छङ्गचरणः। एणेयजङ्घः। अनवनतकायः। कोशगतवस्तिगुह्यः। न्योग्रधपरिमण्डलः। व्यामप्रभः। ऊर्ध्वाङ्गरोमा। एकैकरोमा। एकैकमस्य रोमकूपे जातं नीलं कुण्डलकजातं प्रदक्षिणावर्तम्। काञ्चनसन्निभत्वक्। श्लक्ष्णवत्क्। श्लक्ष्णत्वात् त्वचे रजो मलस्य काये नावतिष्ठते। सप्तोत्सदकायः। सप्तास्योत्सदाः। काये जाताः-द्वौ हस्तयोर्द्वौ पादयोर्द्वावसंयोरेको ग्रीवायाम्। सिंहपूर्वार्धकायः। सुसंवृत्तस्कन्धः। चितान्तरांशः। बहदृजुगात्रः। चत्वारिंशत्समदन्तः। अविरलदन्तः। सुशुक्लदन्तः। सिंहहनुः। प्रभूत-तनुजिह्वः। प्रभूतत्वाज् जिह्वायाः मुखाज्जिहवां निर्णाम्य सर्वमुखमण्डलमवच्छादयति यावन्तकं क्लेशपर्यन्तम्। रसरसाग्रप्राप्तः। ब्रह्मस्वरः। कलविङ्क-मनोज्ञभाणी। दुन्दुभिस्वरनिर्घोषः। अभिनीलनेत्रः। गोपक्ष्मा। उष्णीषशीर्षा। ऊर्णा चास्य भ्रूवोर्मध्ये जाता श्वेता शंखनिभा प्रदक्षिणावर्ता। इदं महापुरुषस्य महापुरुषलक्षणम्।
अशीतिरनुव्यञ्जनानि कतमानि। हस्तपादयोर्विशतिरङ्गुल्यः सपर्वाणः सनखाः। विंशतिरनुव्यञ्जनानि। हस्तपादयोरेवाष्टौ तलानि। द्वयोर्हस्तयोश्चत्वारि द्वयोः पादयोश्चत्वार्यष्टावनुव्यञ्जनानि। षड्‍विधो गुल्फजानूरुसंघातः। षडनुव्यञ्जनानि। षड्‍विधो बाह-संघातः षडनुव्यञ्जनानि। जघनम्। सीवनी च। वृष्णेऽनुव्यञ्जनद्वयं। उपस्थम्। द्वे स्फिचौ अनुव्यञ्जनद्वयम्। त्रिकम्। उदरम्। नाभिः। द्वे पार्श्वे द्वे कक्षे द्वौ स्तनौ‍अभिसमस्य षडनुव्यञ्जने भवन्ति। उरः हृदयं ग्रीवा पृष्ठम्। इत्येत्यानि अधः कायगतानि ग्रीवायाम ऊर्ध्वं स्थापयित्वा षष्टिरनुव्यञ्जनानि भवति। द्वे दन्तमाले द्वे अनुव्यञ्जने। तालुकम्। द्वौ सपरिवारौ चोष्टौ अनुव्यञ्जनद्वयम्। सुपरिपूर्णं कपोलम्। द्वे गण्डे परिपूर्णे सुसंस्कृते अनुव्यञ्जनद्व्यम्। द्वौ अक्षिपरिवारावनुव्यञ्जनद्वयम्। द्वे भ्रुवावनुव्यञ्जनद्वयम्। द्वे नासिकाविले अनुव्यञ्जनद्वयम्। ललाटम्। द्वे शङ्खे द्वौ च कर्णावनुव्यञ्जन-चतुष्टम्। सकेशञ्च शिरोऽनुव्यञ्जनम्। इत्येतानि ग्रीवायाः ऊर्ध्वं काये विंशतिरनुव्यञ्जनानि भवन्ति। पूर्वकानि च षष्टिः पश्चिमकानि च विंशतिरेकध्यमभिसंक्षिप्य अशीतिरनुव्यञ्जनानि भवन्ति। इत्येतानि लक्षणानुव्यञ्जनानि [भद्राणि] शुद्धाशयभूमिप्रविष्टो बोधिसत्त्वो विपाकतः प्रतिलभते। ततस्तूर्ध्वमेषां शुद्धिरुत्तरोत्तरा यावद्बोधिमण्डनिषदनाद् वेदितव्या। परिशिष्टानावेणिकान् सर्वाकार-परिशुद्धादीन् सुविशुद्धान् परिपूर्णान् प्रतिलभते। हीनैस्तु तैः पूर्वमपि बोधिसत्त्वभूतः समन्वागतो भवति शुद्धाध्याशयभूमिमुपादाय। सर्वश्चाविशेषेण बोधिसम्भारः सर्वेषां लक्षणानुव्यञ्जनानां निर्वर्तको भवति।
स पुनर्बोधिसम्भारो द्विविधः। बोधेर्दूरश्चासन्नश्च। तत्र दूरः। यः प्रतिलब्धेषु विपाकतो लक्षणानुव्यञ्जनेषु। आसन्नः। यः प्रतिलब्धेषु तत्प्रथमतो विपाकतो लक्षणानुव्यञ्जनेषु। ततो वा उत्तरोत्तरविशुद्धिविशेषगतेषु।
विचित्रकर्माभिसंस्कारफलानि त्वेतानि लक्षणानुव्यञ्जनानि भगवता [अर्थि-] विनेयवशेन निर्देशितानि। तत्कस्य हेतोः। सत्त्वा विचित्रे पापकर्मसमुदाचारेऽभिरताः। अप्येव ते तस्य पापकस्य कर्मणो विपक्षभूतस्य विचित्रस्य यत्प्रातिपक्षिकं विचित्रं कुशलं लक्षणानुव्यञ्जननिर्वर्तकं कर्म तस्येदं विचित्रफलानुशंसं श्रुत्वा तस्य महतः फलानुशंसस्य स्पृह्यमानरूपारतस्माच्च पापाद्विरमेयुः। तच्च कुशलं समादाय वर्तेरन्निति। यथोक्तं लक्षणसूत्रे। शीलव्रतक्षान्तित्यागेषु प्रतिष्ठितत्वात्सुप्रतिष्ठितपादत्वं प्रतिलभते। मातापित्रोरुपस्थानेन विचित्रेण विचित्रया च सत्त्वोपद्रवारक्षया आगमन-गमनादिपरिस्पन्दमुपादाय चक्राङ्कपादतां प्रतिलभते। परविहिंसामदत्तादानञ्च प्रहाय गुरूणां चाभिवादनवन्दन-प्रत्युत्थानाञ्जलि-सामीची-कर्म कृत्वा परेषां मनस्तुष्टिप्रियभोगाह्रस्वीकरणान् निहतमानत्वाच्च दीर्घाङ्गुलित्वं महापुरुषलक्षणं प्रतिलभते। यैश्च त्रिभिः कर्मभिरेतानि त्रीणि महापुरुषलक्षणानि निर्दिष्टानि तैरेव सर्वैः समस्तैरायतपादपार्ष्णित्वं प्रतिलभते। तत्र त्रयाणामपि लक्षणानां संनिश्रयत्वात् चतुर्भिः संग्रहवस्तुभिर्गुरून् संगृह्य जालपाणिपादतां प्रतिलभते। गुरूणामेव चाभ्यङ्गोद्वर्तन-स्नानाच्छादनानि दत्त्वा मृदुतरुणपाणिपादतां प्रतिलभते। कुशलधर्मासंतुष्ट्या उत्तरोत्तरान् कुशलान्धर्मान्वर्ध यित्वा उच्छङ्गचरणतां प्रतिलभते। यथावद्धर्मानुद्गृह्य पर्यवाप्य परेषां च देशयित्वा दौत्यञ्च सम्यक् परेषां कृत्वा ऐणेयजङ्घतां प्रतिलभते। अनुपूर्वेण धर्मसमादानेन नेत्रीवर्तमानत्वात्पापकं कायवाङ्गमनःकर्म संयमय्य। तत्रानवनतः ग्लानेषु च ग्लानोपस्थानं कृत्वा भैषज्यञ्च दत्त्वा व्याध्यनवनतोच्छ्रयणान् मात्राशी च कामेष्वनवनतः अनवनतकायतां प्रतिलभते। परैर्निर्वासितान् सत्त्वान् धर्मेण समेन संहृत्य ह्रीमानपत्रापी वस्त्रप्रदश्च कोषगतवस्तिगुह्यतां प्रतिलभते। कायवाङ्मनोभिः संवृतात्मा प्रतिग्रह-भोजने च मात्रज्ञः ग्लानेषु भैषज्यप्रदः विषमे कर्मणि प्रतिग्रह-परिभोगवैषम्ये चाप्रवृत्तत्वात् [धातुवैषम्यानु] लोमनाच्च न्यग्रोधपरिमण्डलत्वं प्रतिलभते। येनैव च कर्मणा उत्सङ्गचरणतां प्रतिलभते तेनैवोर्ध्वङ्गरोमताम्। स्वयं कुशलमीमांसकः पण्डितविज्ञ-सेवी सूक्ष्मार्थचिन्तकः गुरूणां स्थानशोधकः उत्सादकः स्नापकश्च एकविहारित्वादेकमित्र-संश्रयत्वात्सूक्ष्मार्थप्रवेशात् तृणपर्णाद्याविलापकर्षणादागन्तुकमलापकर्षणाच्च एकैकरोमतां प्रतिलभते। मनोज्ञप्रीतिकरभोजनपानयानवस्त्रालङ्कारादि-कायपरिष्कारं दत्त्वा अक्रोधनः काञ्चनसन्निभत्वचतां व्यामप्रभताञ्च प्रतिलभते।
येनैव च कर्मणा एकैकरोमतोक्ता तेनैव सूक्ष्मश्लक्ष्णत्वचता वेदितव्या। प्रभूतेनोत्सदेन विशदेनान्नपानेन महाजनकायं संतर्पयित्वा सप्तोत्सदकायतां प्रतिलभते। सत्त्वानामुत्पन्नोत्पन्नेषु धर्मेषु करणीयेषु प्रामुख्येनावस्थितः। नाहं मानी न च निष्ठुरः। अहिताञ्च सत्त्वाना निवारयिता ताडिता हिताहिते च सन्नियोजयिता सिंहपूर्वार्धकायतां प्रतिलभते सिंहवत्सत्त्वार्थेषु पराक्रमशीलत्वात्। अनेनैव च कर्मणा सुसंवृत्तस्कन्धता चितान्तरांशता च वेदितव्या। येनैव च कर्मणा दीर्घाङ्गुलित्वं प्रतिलभते तेनैव बृहद्‍ऋजुगात्रतां प्रतिलभते। मित्रभेदकरीं पिशुनां वाचं प्रहाय भिन्नानाञ्च सत्त्वानां सामग्रीं कृत्वा चत्वारिंशद् दन्ततां समाविरलदन्तताञ्च प्रतिलभते। कामावचरीं मैत्रीं भावयित्वा धर्मार्थचिन्तकः सुशुक्लदन्ततां प्रतिलभते। अर्थिम्यः सत्त्वेभ्यो यथाभिप्रेतं धनं सम्यग्विसृज्य सिंहहनुतां प्रतिलभते। स्वसुतवत्-सत्त्वान्संरक्ष्य श्राद्धश्चानुकम्पकश्च भैषज्यप्रदश्च [प्रसन्नश्च] रसरसाग्रतां प्रतिलभते धर्मरसानुप्रदानाद्धर्मरसास्वादनात् प्रनष्टरसविशोधनाच्च। पञ्च शिक्षापदानि प्राणातिपातविरत्यादीनि स्वयञ्च समादाय संरक्ष्य परांश्च तेष्वेव समादापयित्वा करुणाचित्ततामुपादाय महती धर्मसमादाने प्रतिपन्नत्वादुष्णीषशिरस्कताञ्च प्रभूत-तनुजिह्वतां च प्रतिलभते। सत्यवादितया प्रियवादितया कालधर्मवादितया च ब्रह्मस्वरतां प्रतिलभते। कृत्स्नं जगन्मैत्रेण चेतसाऽनुकम्प्य मातृवत्पितृवदभिनीलनेत्रतां गोपक्ष्मनेत्रताञ्च प्रतिलभते। गुणवतां तु भूतस्य वर्णस्य हर्तां वर्णवादी भ्रुवोर्मध्ये ऊर्णां प्रतिलभते श्वेतां शंखनिभां प्रदक्षिणावर्ताम्। सर्वेषु च द्वात्रिंशत्सु महापुरुषलक्षणेष्वविशेषेण शीलं कारणं प्रतिलम्भाय वेदितव्यम्। तत्कस्य हेतोः। न हि शीलविपन्नो बोधिसत्त्वो मनुष्यत्वमेव तावदासादयेत् कुतः पुनर्महापुरुषलक्षणम्। तत्रोष्णीषशिरस्कता अनव लोकितमूर्धता चैकं महापुरुषक्षणं वेदितव्ये तद्‍व्यतिरेकेणानुपलम्भात्। इदं तावद्विस्तरेण लक्षणाभिनिवृत्त्यानुरूप्येण विचित्रकर्मव्यवस्थानम्।
समासतः पुनश्चतुराकारया पक्षद्वयगतया सुकृतकर्मान्ततया सर्वलक्षणाभिनिर्वृत्तिर्वेदितव्या। तत्र नियतकारितया सुप्रतिष्ठितपादया निर्वर्तते। निपुणकारितया चक्रचरणता उच्छङ्गचरणता जालपाणिपादता सूक्ष्मत्वचता चितान्तरांशता सुसंवृत्तस्कन्धता वृहद्‍ऋजुगात्रता प्रभूततनुजिह्वता च निर्वर्तते। नित्यकारितया दीर्घाङ्ग लित्वं आयतपादपार्ष्णिता अनवनतकायता न्यग्रोधपरिमण्डलता अविरलदन्तता च निर्वर्तते। अनवद्यकारितया परिशिष्टानां लक्षणानामभिनिर्वृत्तिः। तत्र सत्त्वेष्वव्याबाध्यप्रयोगान्मृदुतरुणपाणिपादता श्लक्ष्ण-सूक्ष्म-त्वचता च निर्वर्तते। क्रमप्रयोगाच्च कालप्रयोगाच्च कुशले ऐणेयजङ्घता निर्वर्तते। प्रामोद्यप्रीतिप्रभास्वरेण चित्तेन कुशलसमाचाराद् व्याम-प्रभता च काञ्चनसन्निभत्वचता शुक्लदन्तता ऊर्णा च श्वेता निर्वर्तते। कीर्तिशब्दश्लोकेऽसन्निश्रयात् प्रतिच्छन्न-कल्याणत्वाच्च कोशगतवस्तिगुह्यता निर्वर्तते। बोधाय कुशलमूलपरिणमनादूर्ध्वाङ्ग-रोमता चत्वारिंशत्समदन्तता रसरसाग्रता उष्णीषशिरस्कता च निर्वर्तते। कुशले अतृप्तालीनप्रयोगात् सिंहपूर्वार्धकायता सिंहहनुता च निर्वर्तंते। सत्त्वेषु हितचित्ततया समदर्शनात् समदन्तता अभिनीलनेत्रता गोपक्ष्ममा च निर्वर्तते। हीनेनासन्तुष्टिप्रयोगाच्च ब्रह्मस्वरता च निर्वर्तंते। एवमनया चतुराकारया सुकृतकर्मान्ततया बोधिसत्त्वानामेषां द्वात्रिंशतां-महापुरुष लक्षणानां प्रतिलम्भो विशुद्धिश्च भवति।
तत्र गोत्रभूमौ बोधिसत्त्वानामेतल्लक्षणबीजमात्रेऽवस्थानं वेदितव्यम्। अधिमुक्तिचर्याभूमौ प्राप्त्युपाये वृत्तिरेषां वेदितव्या। अध्याशयशुद्धि भूमौ प्राप्तिरेषां वेदितव्या। तदन्यासु तदुत्तरोत्तरासु बोधिसत्त्वभूमिषु विशुद्धिरेषां वेदितव्या ताथागत्यां निष्ठागमनभूमौ सुविशुद्धतैषां निरुत्तरता च वेदितव्या। तत्र रूपित्वादेषां लक्षणानां हीनमध्योत्तमैश्च सत्त्वैः सूपलक्ष्यत्वात् सत्सु सर्वेष्वेव बुद्धधर्मेषु महापुरुषलक्षणेष्वेतान्येव महापुरुषलक्षणानि व्यवस्थापितानि। एतान्येव च द्वात्रिंशन्महापुरुषलक्षणान्याश्रयभावेन धारयन्त्यानुरूप्याच्च शोभयन्ते तस्मादनुव्यञ्जनानीत्युच्यन्ते।
तत्र समासतः सर्वसत्त्वेषु पुण्यसदृशेन पुण्यस्कन्धेन तथागतस्यैकैको रोमकूपो निर्वर्तते। यावत्सर्वरोमकूपप्रविष्टः पुण्यस्कन्धः। इयता पुण्यस्कन्धेनैकैकमनुव्यञ्जनगति निर्वर्तते। यावत्‍सर्वानुव्यञ्जनप्रविष्टः पुण्यस्कन्धः। ततः शतगुणेन पुण्यस्कन्धेन तथागतस्यैकं लक्षणं निर्वर्तते। यावत्सर्वलक्षणप्रविष्टः पुण्यस्कन्धः स्थापयित्वा ऊर्णामुष्णीषञ्च। ततः सहस्रगुणेन पुण्यस्कन्धेनोर्णा निर्वर्तते।यावानूर्णा-प्रविष्टः पुण्यस्कन्धः ततः शतसहस्रगुणेन पुण्यस्कन्धेन उष्णीषशिरस्कता अनवलोकितमूर्धता च निर्वर्तते। यावानुष्णीषप्रविष्टः पुण्यस्कन्धः। ततः कोटीशतसहस्रगुणेन पुण्यस्कन्धेन तथागतस्य लक्षणानुव्यञ्जनासंगृहीतोऽन्यो धर्मशंख्यो नाम निर्वर्तते। येन तथागत आकांक्षमाणः अनन्तापर्यन्तान् लोकधातून् स्वरेण विज्ञापयति। एवमप्रमेयः पुण्यसम्भार-समुदागतस्तथागतः। तथागतानामचिन्त्यो निरुत्तरः सर्वाकारसम्पत्तिपरिगृहीत आत्मभावो निर्वर्तते।
तेषां पुनर्लक्षणानुव्यञ्जननिर्वर्तकानां कुशलानां कर्मणां समासतस्त्रिभिः कारणेप्रमेयता वेदितव्या। कल्पासंख्येयतयाऽभ्याससमुदागमात् कालाप्रमेयतया‍अप्रमेयसत्त्वहितसुखाशयाधिपतेयत्वादाशयाऽप्रमेयतया अप्रमेयकुशलकर्मवैचित्र्याकाराप्रमेयतया च। तस्मादप्रमेयपुण्यसम्भारसमुदागतस्तथागतानां लक्षणानुव्यञ्जनादय इत्युच्यते।
इति बोधिसत्त्वभूमावाधारे निष्ठे योगस्थाने पञ्चमं लक्षणानुव्यञ्जनपटलम्।

बुधवार, 13 जनवरी 2016

श्रीसरस्वती कवच

श्रीसरस्वती कवच (Shri Sarswati kavach)

श्रीब्रह्मवैवर्त-पुराण के प्रकृतिखण्ड, अध्याय ४ में मुनिवर भगवान नारायण ने मुनिवर नारदजी को बतलाया कि ‘विप्रेन्द्र! श्रीसरस्वती कवच विश्व पर विजय प्राप्त कराने वाला है। जगत्स्त्रष्टा ब्रह्मा ने गन्धमादन पर्वत पर भृगु के आग्रह से इसे इन्हें बताया था।

॥ब्रह्मोवाच॥
श्रृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम्। 
श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम्॥
उक्तं कृष्णेन गोलोके मह्यं वृन्दावने वमे। 
रासेश्वरेण विभुना वै रासमण्डले॥
अतीव गोपनीयं च कल्पवृक्षसमं परम्। 
अश्रुताद्भुतमन्त्राणां समूहैश्च समन्वितम्॥
यद धृत्वा भगवाञ्छुक्रः सर्वदैत्येषु पूजितः। 
यद धृत्वा पठनाद ब्रह्मन बुद्धिमांश्च बृहस्पति॥
पठणाद्धारणाद्वाग्मी कवीन्द्रो वाल्मिको मुनिः। 
स्वायम्भुवो मनुश्चैव यद धृत्वा सर्वपूजितः॥
कणादो गौतमः कण्वः पाणिनीः शाकटायनः। 
ग्रन्थं चकार यद धृत्वा दक्षः कात्यायनः स्वयम्॥
धृत्वा वेदविभागं च पुराणान्यखिलानि च। 
चकार लीलामात्रेण कृष्णद्वैपायनः स्वयम्॥
शातातपश्च संवर्तो वसिष्ठश्च पराशरः। 
यद धृत्वा पठनाद ग्रन्थं याज्ञवल्क्यश्चकार सः॥
ऋष्यश्रृंगो भरद्वाजश्चास्तीको देवलस्तथा। 
जैगीषव्योऽथ जाबालिर्यद धृत्वा सर्वपूजिताः॥

कचवस्यास्य विप्रेन्द्र ऋषिरेष प्रजापतिः। 
स्वयं च बृहतीच्छन्दो देवता शारदाम्बिका॥१

सर्वतत्त्वपरिज्ञाने सर्वार्थसाधनेषु च। 
कवितासु च सर्वासु विनियोगः प्रकीर्तितः॥२

श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वतः। 
श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदावतु॥३

ॐ सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्रे पातु निरन्तरम्। 
ॐ श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदावतु॥४

ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वतोऽवतु। 
ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ओष्ठं सदावतु॥५

ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्मयै स्वाहेति दन्तपङ्क्तीः सदावतु। 
ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदावतु॥६

ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धौ मे श्रीं सदावतु। 
ॐ श्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्षः सदावतु॥७

ॐ ह्रीं विद्यास्वरुपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम्। 
ॐ ह्रीं ह्रीं वाण्यै स्वाहेति मम हस्तौ सदावतु॥८

ॐ सर्ववर्णात्मिकायै पादयुग्मं सदावतु। 
ॐ वागधिष्ठातृदेव्यै सर्व सदावतु॥९

ॐ सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा प्राच्यां सदावतु। 
ॐ ह्रीं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाग्निदिशि रक्षतु॥१०

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा। 
सततं मन्त्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदावतु॥११

ऐं ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैरृत्यां मे सदावतु। 
कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु॥१२

ॐ सर्वाम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदावतु। 
ॐ ऐं श्रीं गद्यपद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेऽवतु॥१३

ऐं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहैशान्यां सदावतु। 
ॐ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोर्ध्वं सदावतु॥१४

ऐं ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाधो मां सदावतु। 
ॐ ग्रन्थबीजरुपायै स्वाहा मां सर्वतोऽवतु॥१५

इति ते कथितं विप्र ब्रह्ममन्त्रौघविग्रहम्। 
इदं विश्वजयं नाम कवचं ब्रह्मरुपकम्॥
पुरा श्रुतं धर्मवक्त्रात पर्वते गन्धमादने। 
तव स्नेहान्मयाऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद वस्त्रालंकारचन्दनैः। 
प्रणम्य दण्डवद भूमौ कवचं धारयेत सुधीः॥
पञ्चलक्षजपैनैव सिद्धं तु कवचं भवेत्। 
यदि स्यात सिद्धकवचो बृहस्पतिसमो भवेत्॥
महावाग्मी कवीन्द्रश्च त्रैलोक्यविजयी भवेत्। 
शक्नोति सर्वे जेतुं स कवचस्य प्रसादतः॥
इदं ते काण्वशाखोक्तं कथितं कवचं मुने। 
स्तोत्रं पूजाविधानं च ध्यानं वै वन्दनं तथा॥
॥इति श्रीब्रह्मवैवर्ते ध्यानमन्त्रसहितं विश्वविजय-सरस्वतीकवचं सम्पूर्णम्॥
(प्रकृतिखण्ड ४।६३-९१)
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या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रान्विता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ।।1।।
आशासु राशीभवदंगवल्लीभासैव दासीकृतदुग्धसिन्धुम ।
मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं वन्देsरविन्दासनसुन्दरि त्वाम ।।2।।
शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे ।
सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात ।।3।।
सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम ।
देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना: ।।4।।
पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्न: सरस्वती ।
प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ।।5।।
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम ।
हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम ।।6।।
वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले, भक्तार्तिनाशिनि विरिंचिहरीशवन्द्ये ।
कीर्तिप्रदेsखिलमनोरथदे महार्हे, विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।।7।।
श्वेताब्जपूर्णविमलासनसंस्थिते हे, श्वेताम्बरावृतमनोहरमंजुगात्रे ।
उद्यन्मनोज्ञसितपंकजमंजुलास्ये, विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम ।।8।।
मातस्त्वदीयपदपंकजभक्तियुक्ता, ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय ।
ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण, भूवह्निवायुगगनाम्बुविनिर्मितेन ।।9।।
मोहान्धकारभरिते ह्रदये मदीये, मात: सदैव कुरु वासमुदारभावे ।
स्वीयाखिलावयवनिर्मलसुप्रभाभि:, शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम ।।10।।
ब्रह्मा जगत सृजति पालयतीन्दिरेश:, शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावै: ।
न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे, न स्यु: कथंचिदपि ते निजकार्यदक्षा: ।।11।।
लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टि: प्रभा धृति: ।
एताभि: पाहि तनुभिरष्टाभिर्मां सरस्वति ।।12।।
सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम: ।
वेदवेदान्तवेदांगविद्यास्थानेभ्य: एव च ।।13।।
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने ।
विद्यारुपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोsस्तु ते ।।14।।

यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ।।15।।

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

शासकीय कार्यालयामध्ये सुलभ मराठी टंकलेखनाबाबत जाणीव व जागृती निर्माण करणेः

टिपणी: (सोबत वेगळे पत्र प्रत्येक कार्यालयासाठी)
(वनिता पवार सोबत चर्चा व उपक्रम)
शासकीय कार्यालयामध्ये सुलभ मराठी टंकलेखनाबाबत जाणीव व जागृती निर्माण करणेः-
शासकीय कार्यालयातील नोकरदारांना वर्ग-४, वर्ग-३, वर्ग-२, वर्ग-१, अशाना संगणक वापरता येतोच असे नाही, परंतू त्यातील वर्ग-३मधील कारकून यांना सक्तीचे असल्याने तो व्यवस्थित पणे हाताळता येतो. व वर्ग-४ ते वर्ग-१ मधिल उरलेले बहुतेक सर्व त्यापासून वंचित असतात. त्यातील काही कर्मचा-यांची इच्छा ही असते की, मलाही संगणक वापरता यावा व मलाही त्यावर काम करता यावे. पण हे सोपे नाही अशी त्यांची समजूत असते.
बहुतेक वरीष्ठ अधिकारी स्वतःच्या व्यवहारांची गरज असल्याने इंग्रजी टंकन हे स्वतः शिकून घेतात व स्पीड कमी असला तरी गरज भागते. त्यामुळे मराठीसाठी काय सुविधा किंवा सोपेपणा आहे हे जाणून घेण्याकडे त्यांचा कल नसतो.
शासकीय कार्यालयामध्ये पुष्कळसा लेखी व्यवहार हा मराठीतूनच होतो. त्यामूळे संगणक हा शासकीय कामासाठी वापरायचा झाला तर शक्य असेल त्या सर्वांना संगणकावर मराठी लिहीता यायला हवे, संगणकात यासाठी काय सोय आहे ते समजायला हवे, पूर्वी कारकून होऊ इच्छीत असणा-या कर्मचा-यांना मराठी टंकन व इंग्रजी टंकन हे सक्तीचे असायचे व त्याचा पूरावा म्हणून एखाद्या टाइपिंग इन्स्टिट्यूटचे पशस्तिपत्रक किंवा इंग्रजी/मराठी टंकन उत्तीर्ण झाल्याबाबतचे प्रमाणपत्र असायचे. ते प्रशिक्षण हे टाईपरायटरवर घेतलेले असायचे व ते मिळवण्यासाठी लोक खासगी शिकवणी लाऊन त्यासाठी बाबत वेगतपासनी परीक्षा देऊन ते मिळवत असत.
टाइपरायटरबाबत विचार केला तर इंग्रजी टंकनाचा की-बोर्ड अवघडच आहे. परंतू इंग्रजी भाषेमध्ये काना, मात्रा, वेलांटी, जोडाक्षरे या सारखी अक्षरे लक्षात ठेवण्यासाठी वेगळी मेहनत नसल्याने तो मराठी भाषेपेक्षा लक्षात ठेवायला थोडा सोपा जातो. जर आपण इंग्रजी कि-बोर्ड आपण १ महीन्यात शिकलो त्यानंतर सरावाने २-३ महीन्यात टंकन वेग वाढण्यास मदत देखील होते. त्या तुलनेत मराठी टंकन शिकायला दुप्पट ते तिप्पट वेळही लागतो. कारण मराठी टंकन करताना काना, मात्रा, वेलांटी, ऊकार, जोडाक्षरासाठीचे वेगळे टंक या बाबी असल्यामुळे त्याबाबतचे वेगळे टंक लक्षात ठेवायला सुमारे ३ महीने लागतात व वेग यायला सुमारे ८ महीने लागतात.
इंग्रजी कि-बोर्ड हा टाईपरायटर व संगणकामध्ये एकसारखाच असतो. जरी तो लक्षात ठेवायला थोडा अवघड असला तरी संगणकावर तोच असल्यामूळे तो कि-बोर्ड लक्षात ठेवण्यावाचून पर्याय नसतो. परंतू मराठी टंकनाचे काय? टाइपरायटरवरील मराठी कि-बोर्ड अतिशय अवघड आहे. तो अतिशय मेहनतीने लक्षात येतो व तितक्याच लवकर तो विसरला ही जातो. कारण त्यावरची अक्षराची रचनाच मुळात उलटसुलट आहे. परंतू सर्व टायपिस्टना तोच माहीत आहे त्यामुळे संगणकावरही तोच ठेवल्यास टायपिस्टना अडचण वाटत नाही.
मात्र संगणकावरील मराठी टंकन करण्यासाठी इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकलेखन हा सरळ व सोप्या पद्धतीचा पर्याय आहे हे शासकीय कार्यालयातील ९९ टक्के कर्मचा-यांना माहीत नाही. मराठी टंकनाबाबतचे जे काही काम आहे ते कार्यालयातील मराठी टायपिस्टच बघतील अशी प्रकारची कल्पना त्याच्या मनात घर करून आहे. कारण मराठी टंकन हे किचकट व अवघड आहे असे समजुन ते याकडे आपण शिकूण घेण्याच्या दृष्टीकोणातून पाहत नाहीत. सदर उपक्रमाचा उद्देश सरळ व सोप्या पद्धतीचे इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकलेखन हे आपल्या शासकीय कार्यालयातील सर्व कर्मचा-यांना कसे अवगत असा आहे.
सोपा का ?
यामध्ये मराठी वर्णमालेनुसार कि-बोर्डची मांडणी केली आहे. त्यामुळे कि-बोर्डवरील मराठी अक्षरांचे क्रम लक्षात ठेवण्यची कटकट संपते. व अतिशय सोप्या पद्धतीने लोकांना इंग्रजी कि-बोर्ड माहीती नसताना ही मराठी टंकन अवगत करता येते.
या टंकलेखनाचे वैशिष्ठ्य म्हणजे डाव्या बाजूला स्वर, काना, मात्रा तर उजव्या बाजूला सर्व व्यंजने आहेत. त्यामूळे एका-आड एक दोन्ही हाताच्या चार-चार अशा आठही बोटांनी टंकन केले जाऊन टंकन केल्याने टंकलेखनाचा वेग वाढवण्यास देखील मदत होते.
उपक्रमाचे स्वरूपः-

कौशलम् न्यास मार्फत सदर उपक्रम हा प्रश्नोत्तर स्वरूपात घेतला जाईल व त्यामध्ये सर्वप्रथम इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकनाबाबत माहीती दिली जाईल. त्यानंतर टाईपरायटर मराठी टंकन पद्धती व इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकन या दोन्ही टंकन पद्धती मध्ये तुलना म्हणून प्रश्नोत्तर तास घेऊन या सोप्या इन्स्क्रिप्ट मराठी टंकन पद्धतीबद्दल माहीती दिली जाईल. असा हा उपक्रम ३ तासासाठी आयोजीत केला जाईल.

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

श्री गंगा स्तोत्र --जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

श्री गंगा स्तोत्र...
रचना : आदि जगद्गुरु शंकराचार्य...
http://greenmesg.org/mantras_slokas/devi_ganga-ganga_stotram.php

दॆवि! सुरॆश्वरि! भगवति! गङ्गॆ त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गॆ ।

शङ्करमौलिविहारिणि विमलॆ मम मतिरास्तां तव पदकमलॆ ॥ 1 ॥

[हे देवी ! सुरेश्वरी ! भगवती गंगे ! आप तीनो लोको को तारने वाली हो... आप शुद्ध तरंगो से युक्त हो... 
महादेव शंकर के मस्तक पर विहार करने वाली हो... हे माँ ! मेरा मन सदैव आपके चरण कमलो पर आश्रित है...

भागीरथिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमॆ ख्यातः ।

नाहं जानॆ तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ 2 ॥
[ हे माँ भागीरथी ! आप सुख प्रदान करने वाली हो... आपके दिव्य जल की महिमा वेदों ने भी गई है... मैं आपकी
महिमा से अनभिज्ञ हू... हे कृपामयी माता ! आप कृपया मेरी रक्षा करें...

हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गॆ हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गॆ ।

दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ 3 ॥
[ हे देवी ! आपका जल श्री हरी के चरणामृत के समान है... आपकी तरंगे बर्फ, चन्द्रमा और मोतिओं के समान 
धवल हैं... कृपया मेरे सभी पापो को नष्ट कीजिये और इस संसार सागर के पार होने में मेरी सहायता कीजिये...

तव जलममलं यॆन निपीतं परमपदं खलु तॆन गृहीतम् ।

मातर्गङ्गॆ त्वयि यॊ भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ 4 ॥

[हे माता ! आपका दिव्य जल जो भी ग्रहण करता है, वह परम पद पता है... हे माँ गंगे ! यमराज भी आपके 
भक्तो का कुछ नहीं बिगाड़ सकते...

पतितॊद्धारिणि जाह्नवि गङ्गॆ खण्डित गिरिवरमण्डित भङ्गॆ ।

भीष्मजननि हॆ मुनिवरकन्यॆ पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्यॆ ॥ 5 ॥

[हे जाह्नवी गंगे ! गिरिवर हिमालय को खंडित कर निकलता हुआ आपका जल आपके सौंदर्य को और भी बढ़ा 
देता है... आप भीष्म की माता और ऋषि जह्नु की पुत्री हो... आप पतितो का उद्धार करने वाली हो... तीनो लोको में आप धन्य हो...

कल्पलतामिव फलदां लॊकॆ प्रणमति यस्त्वां न पतति शॊकॆ ।

पारावारविहारिणिगङ्गॆ विमुखयुवति कृततरलापाङ्गॆ ॥ 6 ॥

[ हे माँ ! आप अपने भक्तो की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली हो... आपको प्रणाम करने वालो को शोक 
नहीं करना पड़ता... हे गंगे ! आप सागर से मिलने के लिए उसी प्रकार उतावली हो जिस प्रकार एक युवती अपने 
प्रियतम से मिलने के लिए होती है...

तव चॆन्मातः स्रॊतः स्नातः पुनरपि जठरॆ सॊपि न जातः ।

नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गॆ कलुषविनाशिनि महिमॊत्तुङ्गॆ ॥ 7 ॥

[हे माँ ! आपके जल में स्नान करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता... हे जाह्नवी ! आपकी महिमा अपार है... आप
अपने भक्तो के समस्त कलुशो को विनष्ट कर देती हो और उनकी नरक से रक्षा करती हो...

पुनरसदङ्गॆ पुण्यतरङ्गॆ जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गॆ ।

इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणॆ सुखदॆ शुभदॆ भृत्यशरण्यॆ ॥ 8 ॥

[हे जाह्नवी ! आप करुणा से परिपूर्ण हो... आप अपने दिव्य जल से अपने भक्तो को विशुद्ध कर देती हो... 
आपके चरण देवराज इन्द्र के मुकुट के मणियो से सुशोभित हैं... शरण में आने वाले को आप सुख और शुभता 
(प्रसन्नता) प्रदान करती हो...

रॊगं शॊकं तापं पापं हर मॆ भगवति कुमतिकलापम् ।

त्रिभुवनसारॆ वसुधाहारॆ त्वमसि गतिर्मम खलु संसारॆ ॥ 9 ॥

[ हे भगवती ! मेरे समस्त रोग, शोक, ताप, पाप और कुमति को हर लो... आप त्रिभुवन का सार हो और वसुधा 
(पृथ्वी) का हार हो... हे देवी ! इस समस्त संसार में मुझे केवल आपका ही आश्रय है...

अलकानन्दॆ परमानन्दॆ कुरु करुणामयि कातरवन्द्यॆ ।

तव तटनिकटॆ यस्य निवासः खलु वैकुण्ठॆ तस्य निवासः ॥ 10 ॥

[हे गंगे ! प्रसन्नता चाहने वाले आपकी वंदना करते हैं... हे अलकापुरी के लिए आनंद-स्रोत... हे परमानन्द 
स्वरूपिणी... आपके तट पर निवास करने वाले वैकुण्ठ में निवास करने वालो की तरह ही सम्मानित हैं...

वरमिह नीरॆ कमठॊ मीनः किं वा तीरॆ शरटः क्षीणः ।

अथवाश्वपचॊ मलिनॊ दीनस्तव न हि दूरॆ नृपतिकुलीनः ॥ 11 ॥

[ हे देवी ! आपसे दूर होकर एक सम्राट बनकर जीने से अच्छा है आपके जल में मछली या कछुआ बनकर 
रहना... अथवा तो आपके तीर पर निर्धन चंडाल बनकर रहना...


भॊ भुवनॆश्वरि पुण्यॆ धन्यॆ दॆवि द्रवमयि मुनिवरकन्यॆ ।

गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरॊ यः स जयति सत्यम् ॥ 12 ॥

[हे ब्रह्माण्ड की स्वामिनी ! आप हमें विशुद्ध करें... जो भी यह गंगा स्तोत्र प्रतिदिन गाता है... वह निश्चित ही
सफल होता है...

यॆषां हृदयॆ गङ्गा भक्तिस्तॆषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।

मधुराकन्ता पञ्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥ 13 ॥

[ जिनके हृदय में गंगा जी की भक्ति है... उन्हें सुख और मुक्ति निश्चित ही प्राप्त होते हैं... यह मधुर लययुक्त
गंगा स्तुति आनंद का स्रोत है...

गङ्गास्तॊत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम् ।

शङ्करसॆवक शङ्कर रचितं पठति सुखी स्तव इति च समाप्तः ॥ 14 ॥

[भगवत चरण आदि जगद्गुरु द्वारा रचित यह स्तोत्र हमें विशुद्ध कर हमें वांछित फल प्रदान करे...
भगवती गंगा देवये नमः ...|