शनिवार, 18 जनवरी 2014
सोमवार, 13 जनवरी 2014
भव के दस लकार -- परस्मैपदी
लकारपरिचय:
धातुरूपाणि दशलकारेषु विभाजितानि सन्ति, अथवा धातो: सर्वेषु वचनेषु, सर्वेषु पुरुषेसु सर्वेषु कालेषु विभाजनम् आहत्य दशलकारेषु एव कृतमस्ति । एते लकारा: लादिवर्णात् प्रारभ्यन्ते अत: लकारा: इति उच्यन्ते । दशलकारा: सन्ति अधोक्ता: ।
- लट् लकार - वर्तमानकाले ।
- लिट् लकार - अनद्यतन-परोक्षभूतकाले ।
- लुट् लकार - अनद्यतनभविष्यतकाले ।
- लृट् लकार - अद्यतनभविष्यतकाले ।
- लेट् लकार - वेदप्रयोगे ।
- लोट् लकार - आज्ञाप्रयोगे ।
- लड्. लकार - अनद्यतनभूतकाले ।
- लिड्. लकार - विधिनिषेधादिप्रयोग, शुभकामनाशीर्वादवचने ।
- लुड्. लकार - अद्यतनभूतकाले ।
- लृड्. लकार - हेतुहेतुमद्भावप्रयोगे ।
लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुड्. लड्. लिटस्तथा ।
विध्याशिषोर्लिड्. लोटौ च लुट् लृट् लृड्. च भविष्यति ।।
इति
अत्र धातो: रूपाणि अकारादिक्रमे एव दास्यन्ते । किन्तु भ्वादिगणस्य प्रथमा धातु: अस्ति भू धातुरिति यस्या: नाम्ना एव अस्य गणस्य नाम भ्वादिगण: इति अस्ति । अतएव अस्या: धातो: रूपाणि पूर्वमेव प्रकाश्यते अत्र । अग्रे अकारादिक्रमे एव संचालयिष्यते ।
लट् लकार: वर्तमानकाल
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | भवति | भवत: | भवन्ति |
| मध्यमपुरुष: | भवसि | भवथ: | भवथ |
| उत्तमपुरुष: | भवामि | भवाव: | भवाम: |
लृट् लकार: सन्निकट भविष्यकाल
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | भविष्यति | भविष्यत: | भविष्यन्ति |
| मध्यमपुरुष: | भविष्यसि | भविष्यथ: | भविष्यथ |
| उत्तमपुरुष: | भविष्यामि | भविष्याव: | भविष्याम: |
लड्. लकार: भूतकाल
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | अभवत् | अभवताम् | अभवन् |
| मध्यमपुरुष: | अभव: | अभवतम् | अभवत |
| उत्तमपुरुष: | अभवम् | अभवाव | अभवाम |
लोट् लकार: आज्ञार्थ
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | भवतु | भवताम् | भवन्तु |
| मध्यमपुरुष: | भव | भवतम् | भवत |
| उत्तमपुरुष: | भवानि | भवाव | भवाम |
विधिलिड्. लकार: करना चाहिये के अर्थमें
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | भवेत् | भवेताम् | भवेयु: |
| मध्यमपुरुष: | भवे: | भवेतम् | भवेत |
| उत्तमपुरुष: | भवेयम् | भवेव | भवेम |
आशीर्लिड्. लकार: आशीर्वचनके अर्थमें
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | भूयात् | भूयास्ताम् | भूयासु: |
| मध्यमपुरुष: | भूया: | भूयास्तम् | भूयास्त |
| उत्तमपुरुष: | भूयासम् | भूयास्व | भूयास्म |
लिट् लकार: भूतकाल
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | बभूव | बभूवतु: | बभूवु: |
| मध्यमपुरुष: | बभूविथ | बभूवथु: | बभूव |
| उत्तमपुरुष: | बभूव | बभूविव | बभूविम |
लुट् लकार: दूरस्थ भविष्य
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | भविता | भवितारौ | भवितार: |
| मध्यमपुरुष: | भवितासि | भवितास्थ: | भवितास्थ |
| उत्तमपुरुष: | भवितास्मि | भवितास्व: | भवितास्म: |
लुड्. लकार: भूतकाल
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | अभूत् | अभूताम् | अभूवन् |
| मध्यमपुरुष: | अभू: | अभूतम् | अभूत |
| उत्तमपुरुष: | अभूवम् | अभूव | अभूम |
लृड्. लकार: भविष्यकाल (यदि, तदा)
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमपुरुष: | अभविष्यत् | अभविष्यताम् | अभविष्यन् |
| मध्यमपुरुष: | अभविष्य: | अभविष्यतम् | अभविष्यत |
| उत्तमपुरुष: | अभविष्यम् | अभविष्याव | अभविष्याम |
इति
प्रस्तोता - SANSKRIT JAGAT
भार्या: (उवाच) -- यद्यहं दिनपत्रिका अभविष्यम् तदा सदा तव हस्तयोः अस्थास्यम् । यदि मैं दिनपत्रिका होऊँ तो सदा ----
भर्ता : (उवाच) -- निस्संशयम् प्रिये, यदि मम भार्या दिनपत्रिका
अभविष्यत् तदा प्रत्यहं सा नवा अभविष्यत् ।
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http://samskrithopasana.blogspot.in/
लकारा:सरला: ....
संस्कृतभाषायां कालबोधनाय दश लकारा: सन्ति l लट्,लिट्,लुट्,लृट्,लेट्,लोट् ,लङ्,लिङ्,लुङ्, लृङ् च l तत्र लिङ् लकार:द्वि प्रकारौ - विधिर्लिन्ग्,आशीर्लिन्ग इति l लेट् लकार: वेदे एव उपयुज्यते l एते लकारा: द्वि प्रकारेण विभज्यते l कालवाची प्रकारवाची चेति l कालवाची शब्देन भूत भावि वर्तमानकाला: संसूच्यन्ते l प्रकारवाची तु आशिषि ,विधि निमन्त्रनार्थे प्रयुज्यते l कालवाची लकारा: लट्,लङ्,लुङ्,लिट्,लुट् ,लृट् चेति l
वर्तमानकाले प्रयुज्यमान :लकार: भवति लट् l उदा :- स: पाठं पठति l
लङ् लकार: अनद्यतनभूतकाले उपयुज्यते l उदा:- अहं पाठं अपठं l
लुङ् लकार: तु भूतकाले प्रयुज्यते l उदा:- प्रात: प्रार्थनां अभूत् l परोक्शभूतकालसूचक : लकार: भवति लिट् l उदा: -पुरा दशरथो नाम राजा बभूव l
लुट् लकार: अनद्यतनभविष्यकाले प्रयुज्यते l उदा: - षोडशे दिनाङ्गे
संस्कृतोल्सवं भविता l
भविष्यदर्थे लृट् उपयुज्यते l उदा:- श्व: अहं मन्दिरं गमिष्यामि l
लोट् ,विधिर्लिन्ग्,आशीर्लिन्ग ,लृङ् च प्रकारवाची लकारा:भवन्ति l
आशिषी विधिनिमन्त्रनादि बोधनाय उपयुज्यमान: लकार :लोट् भवति l उदा :- स्वस्तिर्भवतु सर्वदा l विधिनिमन्त्रानार्थे विधिर्लिन्ग् उपयुज्यते l उदा: - छात्रा : सत्यनिष्टा: भवेयु: l आसीर्लिन् आशिषी उपयुज्यते l उदा :- अध्यापका: त्यागधना: भूयासू : l
लृङ्लकार: हेतुहेतुमत्भावे ,भूते च भविष्यति l उदा: - आगामिनि वर्षे सूर्यतापेन भूमि:ऊषरा: अभविष्यत् l
सर्वमेतत् संगृह्य एवं वक्तुं शक्यते :-
"लट् वर्तमाने तु लेट् वेदे भूते लुङ्, लङ् लिडस्तथा l
विध्याशिशौ तु लिङ् लोदौ लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति l
प्रिया . ए
सर्वोदया उचविद्यालय:,तृक्कूर.
शनिवार, 28 दिसंबर 2013
महाराष्ट्र नामकरण कैसे?-- महाराष्ट्र नामकरण कैसे?
महाराष्ट्र नामकरण कैसे?
महाराष्ट्र नामकरण कैसे? भारत एक राष्ट्र है जो पृथु, इन्द्र, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु, मान्धाता से लेकर भीष्म और युधिष्ठिर तक
विख्यात था जिनका सम्वाद महाभारत, भीष्मपर्व, अध्याय १०में है-
अत्र ते वर्णयिष्यामि वर्षं भारत भारतम्। प्रियमिन्द्रस्य देवस्य मनोर्वैवस्वतस्य च॥५॥
पृथोश्च राजन्वैन्यस्य तथेक्ष्वाकोर्महात्मनः। ययातेरम्बरीषस्य मान्धातुर्नहुषस्य च॥६॥
तथैव मुचुकुन्दस्य शिबेरौशीनरस्य च। ऋषभस्य तथैलस्य नृगस्य नृपतेस्तथा॥७॥
अन्येषां च महाराज क्षत्रियाणां बलीयसाम्। सर्वेषामेव राजेन्द्र प्रियं भारत भारतम्॥८॥
भारतवर्ष की श्रेष्ठता विष्णु पुराण २/३ में है जहां केवल भारत को कर्म भूमि कहा गया है-
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद्भारात्ं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥१॥
नवयोजन साहस्रो विस्तारोऽस्य महामुने। कर्मभूमिरियं स्वर्गमपवर्ग च गच्छताम्॥२॥
महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः। विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः॥३॥
अतः सम्प्राप्यते स्वर्गो मुक्तिमस्मात्प्रयान्ति वै। तिर्यक्त्वं नरकं चापि यान्त्यतः पुरुषा मुने॥४॥
इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यं चान्तश्च गमते। न खल्वन्यत्र मर्त्यानां कर्मभूमौ विधीयते॥५॥
पुरुषैर्यज्ञपुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते। यज्ञैर्यज्ञमयो विष्णुरन्यद्वीपेषु चान्यथा॥२१॥
अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने। यतो हि कर्मभूरेषा ह्यतोऽन्या भोगभूमयः॥२२।।
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥२३॥
इन वर्णनों के अनुसार भारत को ही राष्ट्र या महाराष्ट्र कहना चाहिये था, इस नाम के राज्य को अंगराष्ट्र या
मुख्य अंग कहना उचित
होता। मध्ययुग में यहां के राज्य को राष्ट्रकूट कहते थे। महाराष्ट्र नाम का प्रथम उल्लेख पद्मपुराण के भागवत माहात्म्य में है-अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ। ज्ञान वैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ॥४५॥
उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥
तत्र घोर कलेर्योगात् पाखण्डैः खण्डिताङ्गका। दुर्बलाहं चिरं जाता पुत्राभ्यां सह मन्दताम्॥४९॥
वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी। जाताहं युवती सम्यक् श्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम्॥५०॥
(पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)
यहां ब्रिटिश युग की शिक्षा के विपरीत भक्ति और ज्ञान का जन्म दक्षिण से हुआ और उसका प्रसार क्रमशः उत्तर की तरफ हुआ। बाहर से आकर आर्यों ने वैदिक सभ्यता को दक्षिण पर नहीं थोपा। आकाश में सृष्टि का आरम्भ अप् से हुआ-अप एव ससर्जादौ (मनुस्मृति १/८)। अप् = पदार्थ का समरूप विस्तार। उसमें गति होने से विभिन्न द्रव्यों का मिश्रण होता है और नया पदार्थ उत्पन्न होता है। द्रव्य के भीतर की इस मिश्रण गति को मातरिश्वा कहते हैं क्योंकि यह माता के समान अपने गर्भ में सृष्टि करता है। गति रूप होने से इसका अर्थ वायु भी है-तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति (ईशावास्योपनिषद् ४)। इसी प्रकार दक्षिण भारत भी समुद्री यात्रा द्वारा विश्व के सम्पर्क में था अतः भारत सभी देशों के लिये आचरण का प्रमाण था। मलयालम-मलयेसिया। अनाम (आन्ध्र)-वियतनाम। कन्याकुमारी-केन्या। मुम्बई-मोम्बासा। अंग (पश्चिम बंग)-अंग या अग्नि द्वीप (आस्ट्रेलिया-वायुपुराण), चम्पा (भागलपुर)-चम्पा (कम्बोडिया) आदि। समुद्रीक्षेत्र से सभ्यता का विकास होने से इसे द्रविड़ कहा गया। यह व्यापार का केन्द्र था जहां पैसा भी द्रव्य की तरह बहता है, अतः द्रविड़ = धन, द्रव्य = पैसा।
ज्ञान का विस्तार कर्णाटक में हुआ। इसका मूल वेद है जो मनुष्य द्वारा विश्व का अनुभव है। अनुभव ५ ज्ञानेन्द्रियों द्वारा है, जिसमें प्रथम माध्यम शब्द है जो मूल तत्त्व आकाश का गुण है। अतः इसकी क्रिया श्रुति का अर्थ वेद है। श्रुति का ग्रहण कर्ण से होता है अतः इसके विकास का स्थान कर्णाटक हुआ। उसके बाद वैदिक ज्ञान का जहां तक विस्तार हुआ वह क्षेत्र महाराष्ट्र होगा-महः = प्रभाव क्षेत्र या विस्तार।
विस्तार का एक माध्यम लिपि है जिसका आरम्भ बृहस्पति ने किया। उनको गणपति या ब्रह्मणस्पति भी कहा गया है। गण-पति= वर्णों के या मनुष्यों के गण का पति। ब्रह्मणस्पति = ब्रह्मा द्वारा अधिकृत। इस कारण उनके स्थान को ऋग्वेद (२/२३) में महान, ज्येष्ठ कहा गया है-
गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नृतिभिः सीद सादनम्॥१॥
देवाश्चित्ते असुर्य प्रचेतसो बृहस्पते यज्ञियं भागमानशुः।
उस्राइव सूर्यो ज्योतिषा महो विश्वेपाभिज्जनिता ब्रह्मणामसि॥२॥
सुनीतिभिर्नयसि त्रायसे जनं यस्तुभ्यं दाशान्न तमंहो अश्नवत्।
ब्रह्मद्विषस्तपनो मन्युमीरसि बृहस्पते महि ते महित्वनम्॥४॥
बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदतच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्॥१५॥
ऋत का क्षेत्र उत्तर का समतल कृषिप्रधान भाग है, द्रविण समुद्र तट है। दोनों का समन्वय स्थान महाराष्ट्र हुआ जहां लिपि का एकीकरण हुआ। पहले शब्दों की रचना हुयी, तब लेखर्षभ इन्द्र ने उच्चारण स्थान के आधार पर उनको वर्णों में व्याकृत किया जिसको व्याकरण कहा गया।
बृहस्पते प्रथमं वाचा अग्रं यत्प्रैरत नामधेयं दधानाः।
यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः॥ (ऋग्वेद १०/७१/१)
यही ब्रह्मा द्वारा कर्मों तथा संस्थाओं के अनुसार नामकरण है जो वेद पर आधारित है-
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्। वेद शब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥ (मनु स्मृति १/२१)
७ संस्थाओं के कारण ७ प्रकार की लिपि हुई-यास्सप्त संस्था या एवैतास्सप्त होत्राः प्राचीर्वषट् कुर्वन्ति ता एव ताः। (जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद् १/२१/४)
महाराष्ट्र नामकरण कैसे? भारत एक राष्ट्र है जो पृथु, इन्द्र, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु, मान्धाता से लेकर भीष्म और युधिष्ठिर तक
विख्यात था जिनका सम्वाद महाभारत, भीष्मपर्व, अध्याय १०में है-
अत्र ते वर्णयिष्यामि वर्षं भारत भारतम्। प्रियमिन्द्रस्य देवस्य मनोर्वैवस्वतस्य च॥५॥
पृथोश्च राजन्वैन्यस्य तथेक्ष्वाकोर्महात्मनः। ययातेरम्बरीषस्य मान्धातुर्नहुषस्य च॥६॥
तथैव मुचुकुन्दस्य शिबेरौशीनरस्य च। ऋषभस्य तथैलस्य नृगस्य नृपतेस्तथा॥७॥
अन्येषां च महाराज क्षत्रियाणां बलीयसाम्। सर्वेषामेव राजेन्द्र प्रियं भारत भारतम्॥८॥
भारतवर्ष की श्रेष्ठता विष्णु पुराण २/३ में है जहां केवल भारत को कर्म भूमि कहा गया है-
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद्भारात्ं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥१॥
नवयोजन साहस्रो विस्तारोऽस्य महामुने। कर्मभूमिरियं स्वर्गमपवर्ग च गच्छताम्॥२॥
महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः। विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः॥३॥
अतः सम्प्राप्यते स्वर्गो मुक्तिमस्मात्प्रयान्ति वै। तिर्यक्त्वं नरकं चापि यान्त्यतः पुरुषा मुने॥४॥
इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यं चान्तश्च गमते। न खल्वन्यत्र मर्त्यानां कर्मभूमौ विधीयते॥५॥
पुरुषैर्यज्ञपुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते। यज्ञैर्यज्ञमयो विष्णुरन्यद्वीपेषु चान्यथा॥२१॥
अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने। यतो हि कर्मभूरेषा ह्यतोऽन्या भोगभूमयः॥२२।।
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥२३॥
इन वर्णनों के अनुसार भारत को ही राष्ट्र या महाराष्ट्र कहना चाहिये था, इस नाम के राज्य को अंगराष्ट्र या
मुख्य अंग कहना उचित
होता। मध्ययुग में यहां के राज्य को राष्ट्रकूट कहते थे। महाराष्ट्र नाम का प्रथम उल्लेख पद्मपुराण के भागवत माहात्म्य में है-अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ। ज्ञान वैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ॥४५॥
उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥
तत्र घोर कलेर्योगात् पाखण्डैः खण्डिताङ्गका। दुर्बलाहं चिरं जाता पुत्राभ्यां सह मन्दताम्॥४९॥
वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी। जाताहं युवती सम्यक् श्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम्॥५०॥
(पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)
यहां ब्रिटिश युग की शिक्षा के विपरीत भक्ति और ज्ञान का जन्म दक्षिण से हुआ और उसका प्रसार क्रमशः उत्तर की तरफ हुआ। बाहर से आकर आर्यों ने वैदिक सभ्यता को दक्षिण पर नहीं थोपा। आकाश में सृष्टि का आरम्भ अप् से हुआ-अप एव ससर्जादौ (मनुस्मृति १/८)। अप् = पदार्थ का समरूप विस्तार। उसमें गति होने से विभिन्न द्रव्यों का मिश्रण होता है और नया पदार्थ उत्पन्न होता है। द्रव्य के भीतर की इस मिश्रण गति को मातरिश्वा कहते हैं क्योंकि यह माता के समान अपने गर्भ में सृष्टि करता है। गति रूप होने से इसका अर्थ वायु भी है-तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति (ईशावास्योपनिषद् ४)। इसी प्रकार दक्षिण भारत भी समुद्री यात्रा द्वारा विश्व के सम्पर्क में था अतः भारत सभी देशों के लिये आचरण का प्रमाण था। मलयालम-मलयेसिया। अनाम (आन्ध्र)-वियतनाम। कन्याकुमारी-केन्या। मुम्बई-मोम्बासा। अंग (पश्चिम बंग)-अंग या अग्नि द्वीप (आस्ट्रेलिया-वायुपुराण), चम्पा (भागलपुर)-चम्पा (कम्बोडिया) आदि। समुद्रीक्षेत्र से सभ्यता का विकास होने से इसे द्रविड़ कहा गया। यह व्यापार का केन्द्र था जहां पैसा भी द्रव्य की तरह बहता है, अतः द्रविड़ = धन, द्रव्य = पैसा।
ज्ञान का विस्तार कर्णाटक में हुआ। इसका मूल वेद है जो मनुष्य द्वारा विश्व का अनुभव है। अनुभव ५ ज्ञानेन्द्रियों द्वारा है, जिसमें प्रथम माध्यम शब्द है जो मूल तत्त्व आकाश का गुण है। अतः इसकी क्रिया श्रुति का अर्थ वेद है। श्रुति का ग्रहण कर्ण से होता है अतः इसके विकास का स्थान कर्णाटक हुआ। उसके बाद वैदिक ज्ञान का जहां तक विस्तार हुआ वह क्षेत्र महाराष्ट्र होगा-महः = प्रभाव क्षेत्र या विस्तार।
विस्तार का एक माध्यम लिपि है जिसका आरम्भ बृहस्पति ने किया। उनको गणपति या ब्रह्मणस्पति भी कहा गया है। गण-पति= वर्णों के या मनुष्यों के गण का पति। ब्रह्मणस्पति = ब्रह्मा द्वारा अधिकृत। इस कारण उनके स्थान को ऋग्वेद (२/२३) में महान, ज्येष्ठ कहा गया है-
गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नृतिभिः सीद सादनम्॥१॥
देवाश्चित्ते असुर्य प्रचेतसो बृहस्पते यज्ञियं भागमानशुः।
उस्राइव सूर्यो ज्योतिषा महो विश्वेपाभिज्जनिता ब्रह्मणामसि॥२॥
सुनीतिभिर्नयसि त्रायसे जनं यस्तुभ्यं दाशान्न तमंहो अश्नवत्।
ब्रह्मद्विषस्तपनो मन्युमीरसि बृहस्पते महि ते महित्वनम्॥४॥
बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदतच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्॥१५॥
ऋत का क्षेत्र उत्तर का समतल कृषिप्रधान भाग है, द्रविण समुद्र तट है। दोनों का समन्वय स्थान महाराष्ट्र हुआ जहां लिपि का एकीकरण हुआ। पहले शब्दों की रचना हुयी, तब लेखर्षभ इन्द्र ने उच्चारण स्थान के आधार पर उनको वर्णों में व्याकृत किया जिसको व्याकरण कहा गया।
बृहस्पते प्रथमं वाचा अग्रं यत्प्रैरत नामधेयं दधानाः।
यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः॥ (ऋग्वेद १०/७१/१)
यही ब्रह्मा द्वारा कर्मों तथा संस्थाओं के अनुसार नामकरण है जो वेद पर आधारित है-
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्। वेद शब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥ (मनु स्मृति १/२१)
७ संस्थाओं के कारण ७ प्रकार की लिपि हुई-यास्सप्त संस्था या एवैतास्सप्त होत्राः प्राचीर्वषट् कुर्वन्ति ता एव ताः। (जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद् १/२१/४)
गुरुवार, 26 दिसंबर 2013
पठामि संस्कृतम्
पठामि संस्कृतम्
भाग १
भाग १
एकधा दशधा चैव शतधा च सहस्रधा।
रणे पार्थशरोवृष्टिर्दानं ब्रह्मविधे यथा॥
Meaning : A gift given to a knowledgeable (one who knows brahman) person is like the arrow of Arjuna in the battlefield! When taken, it is single; when set to the bow, ten; when released, a hundred; on the way, a thousand; and when hitting the target, becomes a shower!
वदनं प्रसादसदनं सदयं हृदयं सुधामुचो वाच: |
करणं परोपकरणं येषां केषां न ते वन्द्या: ||
-- A person whose face is always charming/enthusiastic, heart is full of compassion, speech is like nectar and whose work is to help the needy; such a person will always be respected by all.
षड् गुणा: पुरुषेणेह त्यक्तव्या न कदाचन |
सत्यं दानम् अनालस्यम् अनसूया क्षमा धॄति: ||
-- A person should never give up following six qualities: sticking on to truth, generosity, activeness, being free from jealousy, tolerance and Confidence.
गुरुवार, 5 दिसंबर 2013
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अथ समासचक्रं प्रारभ्यते ।
षोढाः समासाः संक्षेपात् अष्टाविंशतिधा स्मृताः ।
नित्यानित्यत्वयोगेन लुगलुक्त्वेन च द्विधा ॥
तत्राष्टधा तत्पुरुषः सप्तधा कर्मधारयः ।
सप्तधा च बहुव्रीहिर्द्विगुराभाषितो द्विधा ॥
चकारबहुलो द्वंद्वः स चासौ कर्मधारयः ।
यस्य येषां बहुव्रीहिः शेषस्तत्पुरुषः स्मृतः ॥
अथ समासविधिः कथ्यते ।
समासाः षड्-विधाः । तत्पुरुषः कर्मधारयः बहुव्रीहिर्द्विगुर्द्वंद्वः अव्ययीभावश्चेति भेदात् ।
पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावः ।
उत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषः ।
उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः ।
अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः ।
Some typical examples of the main types of “Samaas” are compiled in the following verse.
वृक्षशाखा तत्पुरुषः श्वेताश्वः कर्मधारयः ।
रक्तवस्त्रो बहुव्रीहिः द्वंद्वश्चन्द्रदिवाकरौ ॥
प्रथमातत्पुरुषो द्वितीयातत्पुरुषस्तृतीयातत्पुरुषश्चतुर्थीतत्पुरुषः ।
पंचमीतत्पुरुषः षष्ठीतत्पुरुषः सप्तमीतत्पुरुषो नञ्-तत्पुरुषश्चेति ॥
Various examples of all these types of Tat-purush are given. I have not scripted them.
स च विशेष्यपूर्वपदो विशेषणपूर्वपदो विशेषणोभयपदः उपमानपूर्वपदः ।
उपमानोत्तरपदः संभावनापूर्वपदोऽवधारणापूर्वपदश्चेति-भेदात् सप्तविधः॥
The examples of different types of Karma-dhaaray do recognise the “Madhyama-pada-lopee” type also. I had raised a query on this, in my post of 9th July. The examples given are -
मध्यमपदलोपी समासः यथा शाकप्रियः पार्थिवः = शाकपार्थिवः । देवपूजकः ब्राम्हणः = देवब्राम्हणः ।
स च द्विपदो बहुपदः सहपूर्वपदः संख्योभयपदो व्यतिहारलक्षणो दिगन्तराललक्षणश्चेति भेदात् सप्तविधः ।
द्विगुसमासः द्विविधःलृ एकवद्-भावी अनेकवद्-भावी चेति ।
द्वंद्वोऽपि द्विविधः इतरेतरसमाहारभेदात् ।
सः यथा – तटं तटं प्रति = अनुतटम् ।
क्रमं अनतिक्रम्य वर्तते इति यथाक्रमम् ।
वेलायामिति अधिवेलम् ।
कुंभस्य समीपे वर्तते इति उपकुंभम् ।
मक्षिकाणां अभावः निर्मक्षिकम् ।
हिमस्य अत्ययः अतिहिमम् ।
कृष्णा एव मेघाः कृष्णमेघाः ।
पंके रुहतीति पंकेरुहम् ।
मत्वर्थीयो यथा बुद्धिरस्यास्तीति बुद्धिमान् ।
धनमस्यास्तीति धनवान् ।
(इ)
http://www.blogger.com शीलनिधि गुप्ता के ब्लॉगसे --(ई)
ज्ञानदीप एज्यूकेशन व रिसर्च फाउंडेशन सांगली यांची साइट http://www.sanskritdeepika.org/ वरून --२) तत्पुरुष उत्तरपदप्रधान
३) द्वन्द्व उभयपदप्रधान
४) बहुव्रीहि अन्यपदप्रधान
१) कर्मधारय - द्विगु हा कर्मधारय समासाचा पोटप्रकार
२) विभक्ति तत्पु.
३) नञ्तत्पु.
४) प्रादितत्पु.
५) उपपदतत्पु.
१) इतरेतर द्वन्द्व
२) समाहार द्वन्द्व
१) समानाधिकरण बहुब्रीही
२) व्याधिकरण बहुब्रीही
३) नञ्बहुब्रीही
४) सहबहुब्रीही
५) प्रादिबहुब्रीही
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(उ)
(ऊ)